पदच्छेदः
| वृतां | वृत (√वृ + क्त, २.१) |
| नानाविधैर् | नानाविध (३.३) |
| वृक्षैः | वृक्ष (३.३) |
| पुष्पोपगफलोपगैः | पुष्प–उपग–फल–उपग (३.३) |
| कोकिलैर् | कोकिल (३.३) |
| भृङ्गराजैश्च | भृङ्गराज (३.३)–च (अव्ययः) |
| मत्तैर् | मत्त (√मद् + क्त, ३.३) |
| नित्यनिषेविताम् | नित्य–निषेवित (√नि-सेव् + क्त, २.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वृ | तां | ना | ना | वि | धै | र्वृ | क्षैः |
| पु | ष्पो | प | ग | फ | लो | प | गैः |
| को | कि | लै | र्भृ | ङ्ग | रा | जै | श्च |
| म | त्तै | र्नि | त्य | नि | षे | वि | ताम् |