धर्मतो यो भवेद्विप्रः क्षत्रियो वीर्यतो भवेत् ।
क्रोधाद्यश्च भवेदग्निः क्षान्त्या च वसुधासमः ॥
धर्मतो यो भवेद्विप्रः क्षत्रियो वीर्यतो भवेत् ।
क्रोधाद्यश्च भवेदग्निः क्षान्त्या च वसुधासमः ॥
पदच्छेदः
| धर्मतो | धर्म (५.१) |
| यो | यद् (१.१) |
| भवेद् | भवेत् (√भू विधिलिङ् प्र.पु. एक.) |
| विप्रः | विप्र (१.१) |
| क्षत्रियो | क्षत्रिय (१.१) |
| वीर्यतो | वीर्य (५.१) |
| भवेत् | भवेत् (√भू विधिलिङ् प्र.पु. एक.) |
| क्रोधाद् | क्रोध (५.१) |
| यश्च | यद् (१.१)–च (अव्ययः) |
| भवेद् | भवेत् (√भू विधिलिङ् प्र.पु. एक.) |
| अग्निः | अग्नि (१.१) |
| क्षान्त्या | क्षान्ति (३.१) |
| च | च (अव्ययः) |
| वसुधासमः | वसुधा–सम (१.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ध | र्म | तो | यो | भ | वे | द्वि | प्रः |
| क्ष | त्रि | यो | वी | र्य | तो | भ | वेत् |
| क्रो | धा | द्य | श्च | भ | वे | द | ग्निः |
| क्षा | न्त्या | च | व | सु | धा | स | मः |