पदच्छेदः
| ते | तद् (१.३) |
| द्विजाः | द्विज (१.३) |
| पूर्णकलशैः | पूर्ण (√पृ + क्त)–कलश (३.३) |
| सर्वतीर्थाम्बुसत्कृतम् | सर्व–तीर्थ–अम्बु–सत्कृत (√सत्-कृ + क्त, २.१) |
| गृहीत्वा | गृहीत्वा (√ग्रह् + क्त्वा) |
| फलमूलं | फल–मूल (२.१) |
| च | च (अव्ययः) |
| रामस्याभ्याहरन् | राम (६.१)–अभ्याहरन् (√अभ्या-हृ लङ् प्र.पु. बहु.) |
| बहु | बहु (२.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ते | द्वि | जाः | पू | र्ण | क | ल | शैः |
| स | र्व | ती | र्था | म्बु | स | त्कृ | तम् |
| गृ | ही | त्वा | फ | ल | मू | लं | च |
| रा | म | स्या | भ्या | ह | र | न्ब | हु |