M N Dutt
Having thus addressed Satrughna, Rāma again and again praised him and said.पदच्छेदः
| एवम् | एवम् (अव्ययः) |
| उक्त्वा | उक्त्वा (√वच् + क्त्वा) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| काकुत्स्थं | काकुत्स्थ (२.१) |
| प्रशस्य | प्रशस्य (√प्र-शंस् + ल्यप्) |
| च | च (अव्ययः) |
| पुनः | पुनर् (अव्ययः) |
| पुनः | पुनर् (अव्ययः) |
| पुनर् | पुनर् (अव्ययः) |
| एवापरं | एव (अव्ययः)–अपर (२.१) |
| वाक्यम् | वाक्य (२.१) |
| उवाच | उवाच (√वच् लिट् प्र.पु. एक.) |
| रघुनन्दनः | रघुनन्दन (१.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ए | व | मु | क्त्वा | तु | का | कु | त्स्थं |
| प्र | श | स्य | च | पु | नः | पु | नः |
| पु | न | रे | वा | प | रं | वा | क्य |
| मु | वा | च | र | घु | न | न्द | नः |