पदच्छेदः
| अभिषिञ्चन्महात्मानावुभावेव | अभिषिञ्चन् (√अभि-सिच् लङ् प्र.पु. बहु.)–महात्मन् (२.२)–उभ् (२.२)–एव (अव्ययः) |
| कुशीलवौ | कुशीलव (२.२) |
| रथानां | रथ (६.३) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| सहस्राणि | सहस्र (२.३) |
| त्रीणि | त्रि (२.३) |
| नागायुतानि | नाग–अयुत (२.३) |
| च | च (अव्ययः) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | भि | षि | ञ्च | न्म | हा | त्मा | ना |
| वु | भा | वे | व | कु | शी | ल | वौ |
| र | था | नां | तु | स | ह | स्रा | णि |
| त्री | णि | ना | गा | यु | ता | नि | च |