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दुदोह गां स यज्ञाय सस्याय मघवा दिवम् ।
संपद्विनिमयेनोभौ दधतुर्भुवनद्वयम् ॥

अन्वयः AI सः यज्ञाय गाम् दुदोह मघवा सस्याय दिवम् (दुदोह) उभौ संपद्विनिमयेन भुवनद्वयम् दधतुः।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) दुदोहेति॥ स राजा यज्ञाय यज्ञं कर्तुं गां भुवं दुदोह। करग्रहणेन रिक्तां चकारेत्यर्थः। मघवा देवेन्द्रः सस्याय सस्यं वर्धयितुं दिवं स्वर्गं दुदोह। द्युलोकान्महीलोके वृष्टिमुत्पादयामासेत्यर्थः। क्रियार्थोपपदस्य- (अष्टाध्यायी २.३.१४ ) इत्यादेना यज्ञसस्याभ्यां चतुर्थीं। एवमुभौ संपदो विनिमयेन परस्परमादानप्रतिदानाभ्यां भुवनद्वयं दधतुः पुपुषतुः। राजा यज्ञैरिन्द्रलोकमिन्द्रश्चोदकेन भूलोकं पुपोषेत्यर्थः। उक्तं च दण्डनीतौ-राजा त्वर्थान्समाहृत्य कुर्यादिन्द्रमहोत्सवम्। प्रीणितो मेघवाहस्तु महतीं वृष्टिमावहेत् ॥ इति ॥
Summary AI Dilīpa milked the earth for sacrifices, while Indra milked the heavens for crops; thus, by exchanging riches, they both sustained the two worlds.
सारांश AI राजा दिलीप ने यज्ञ के लिए पृथ्वी का दोहन किया और इंद्र ने अन्न के लिए स्वर्ग का। इस प्रकार संपत्तियों के विनिमय से दोनों ने दोनों लोकों को पुष्ट किया।
पदच्छेदः AI
दुदोहदुदोह (√दुह् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) milked
गाम्गो (२.१) the earth
सःतद् (१.१) he
यज्ञाययज्ञ (४.१) for sacrifice
सस्यायसस्य (४.१) for crops
मघवामघवन् (१.१) Indra
दिवम्दिव् (२.१) the heaven
संपद्विनिमयेनसंपद्विनिमय (√मि+अच्, ३.१) by exchange of wealth
उभौउभ (१.२) both
दधतुःदधतुः (√धा कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. द्वि.) sustained
भुवनद्वयम्भुवनद्वय (२.१) the two worlds
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
दु दो गां ज्ञा
स्या वा दि वम्
सं द्वि नि ये नो भौ
तु र्भु द्व यम्
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