अथेप्सितं भर्तुरुपस्थितोदयं
सखीजनोद्वीक्षणकौमुदीमुखम् ।
निदानमिक्ष्वाकुकुलस्य संततेः
सुदक्षिणा दौर्हृदलक्षणं दधौ ॥
अथेप्सितं भर्तुरुपस्थितोदयं
सखीजनोद्वीक्षणकौमुदीमुखम् ।
निदानमिक्ष्वाकुकुलस्य संततेः
सुदक्षिणा दौर्हृदलक्षणं दधौ ॥
सखीजनोद्वीक्षणकौमुदीमुखम् ।
निदानमिक्ष्वाकुकुलस्य संततेः
सुदक्षिणा दौर्हृदलक्षणं दधौ ॥
अन्वयः
AI
अथ सुदक्षिणा भर्तुः ईप्सितम्, उपस्थित-उदयम्, सखी-जन-उद्वीक्षण-कौमुदी-मुखम्, इक्ष्वाकु-कुलस्य संततेः निदानम् दौर्हृद-लक्षणम् दधौ ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अथेति॥ अथ गर्भधारणानन्तरम्। सुदक्षिणा। उपस्थितोदयं प्राप्तकालं भर्तुर्दिलीपस्येप्सितं मनोरथम्। भावे क्तः। पुनः सखीजनस्योद्वीक्षणानां दृष्टीनां कौमुदीमुखं चन्द्रिकाप्रादुर्भावम्। यद्वा, -कौमुदी नाम दीपोत्सपतिथिः। तदुक्तं भविष्योत्तरे-
कौ मोदन्ते जना यस्यां तेनासौ कौमुदी मता इति। तस्या मुखं प्रारम्भम्। अत एव केचित्-सखीजनोद्वीक्षणकौमुदीमहम् इति पाठं पठन्ति। इक्ष्वाकुकुलस्य संतते रविच्छेदस्य निदानं मूलकारणम्। निदानं त्वादिकारणम् इत्यमरः (अमरकोशः १.४.३० ) । एवंविधं दौर्हृदलक्षणं गम्भचिह्नं वक्ष्यमाणं दधौ। स्वहृदयेन गर्भहृदयेन च द्विहृदया गर्भिणी। यथाह वाग्भटः(अ.हृ.शा.१।५२)-मातृजं ह्यस्य हृदयं मातुश्च हृदयं तु तत्। संबद्धं तेन गर्भिण्याः श्रेष्ठं श्रद्धाभिमाननम्॥ इति। तत्संबन्धित्वाद्गर्भो दौर्हृदमित्युच्यते। सा च तद्योगाद्दौहृदिनीति। तदुक्तं संग्रहे(अ.२)-द्विहृदयां नारीं दौर्हृदिनीमाचक्षते इति। अत्र दौर्हृदलक्षणस्येप्सितत्वेन कौमुदीमुखत्वेन च निरूपणाद्रूपकालंकारः। अस्मिन्सर्गे वंशस्थं वृत्तम्-जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ इति लक्षणात् ॥
Summary
AI
Then, Sudakshina began to show the signs of pregnancy cravings. This was the desired outcome for her husband, the dawn of their hopes, a joyous sight for her friends like a moonlight festival, and the primary cause for the continuation of the Ikshvaku dynasty.
सारांश
AI
रानी सुदक्षिणा ने इक्ष्वाकु वंश की निरंतरता के मूल कारण स्वरूप गर्भ के लक्षणों को धारण किया, जो सखियों के लिए प्रसन्नतादायक और पति की मनोकामना की निकट भविष्य में सिद्धि के समान थे।
पदच्छेदः
AI
| अथ | अथ | then |
| ईप्सितं | ईप्सित (√आप्+सन्+क्त, २.१) | the desired thing |
| भर्तुः | भर्तृ (६.१) | of her husband |
| उपस्थितोदयं | उपस्थित–उदय (२.१) | the result of which had arrived |
| सखीजनोद्वीक्षणकौमुदीमुखम् | सखी–जन–उद्वीक्षण–कौमुदी–मुख (२.१) | which was like the beginning of a moonlight festival for the upward glances of her friends |
| निदानम् | निदान (२.१) | the primary cause |
| इक्ष्वाकुकुलस्य | इक्ष्वाकु–कुल (६.१) | of the Ikshvaku dynasty |
| संततेः | संतति (६.१) | of the lineage |
| सुदक्षिणा | सुदक्षिणा (१.१) | Sudakshina |
| दौर्हृदलक्षणं | दौर्हृद–लक्षण (२.१) | the sign of pregnancy craving |
| दधौ | दधौ (√धा कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | bore |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | थे | प्सि | तं | भ | र्तु | रु | प | स्थि | तो | द | यं |
| स | खी | ज | नो | द्वी | क्ष | ण | कौ | मु | दी | मु | खम् |
| नि | दा | न | मि | क्ष्वा | कु | कु | ल | स्य | सं | त | तेः |
| सु | द | क्षि | णा | दौ | र्हृ | द | ल | क्ष | णं | द | धौ |
| ज | त | ज | र | ||||||||
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.