विन्ध्यस्य संस्तम्भयिता महाद्रे-
र्निःशेषपीतोज्झितसिन्धुराजः ।
प्रीत्याश्वमेधावभृथार्द्रमूर्तेः
सौस्नातिको यस्य भवत्यगस्त्यः ॥
विन्ध्यस्य संस्तम्भयिता महाद्रे-
र्निःशेषपीतोज्झितसिन्धुराजः ।
प्रीत्याश्वमेधावभृथार्द्रमूर्तेः
सौस्नातिको यस्य भवत्यगस्त्यः ॥
र्निःशेषपीतोज्झितसिन्धुराजः ।
प्रीत्याश्वमेधावभृथार्द्रमूर्तेः
सौस्नातिको यस्य भवत्यगस्त्यः ॥
अन्वयः
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महा-अद्रेः विन्ध्यस्य संस्तम्भयिता, निःशेष-पीत-उज्झित-सिन्धु-राजः अगस्त्यः, यस्य अश्वमेध-अवभृथ-आर्द्र-मूर्तेः प्रीत्या सौस्नातिकः भवति ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
विन्ध्यस्येति॥ विन्ध्यस्य नाम्नो महाद्रेः। तपनमार्गनिरोधाय वर्धमानस्येति शेषः। संस्तम्भयिता निवारयिता। निःशेषं पीत उज्झितः पुनस्त्यक्तः सिन्धुराजः समुद्रो येन सोऽगस्त्योश्वमेधस्यावभृथे दीक्षान्ते कर्मणि।
दीक्षान्तोऽवभृथो यज्ञे इत्यमरः (अमरकोशः २.७.२९ ) । आर्द्रमूर्तेः। स्नातस्येत्यर्थथः। यस्य पाण्ड्यस्य प्रीत्या स्नेहेन। न तु दाक्षिण्येन। सुस्नातं पृच्छतीति सौस्नातिकः। भवति। पृच्छतौ सुस्रातादिभ्यः(वा.२९५३) इत्युपसंख्यानाट्टक् ॥
Summary
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The sage Agastya—who stopped the growth of the great Vindhya mountain and who drank the entire ocean only to release it again—lovingly performs the post-ritual bath ceremony for this king, whose head is wet from the purificatory bath of the Ashvamedha sacrifice.
सारांश
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ये पांड्य नरेश हैं, जिनके पुरोहित अगस्त्य मुनि हैं। वही अगस्त्य जिन्होंने विंध्य पर्वत को झुकाया और समुद्र को पी लिया था, वे अश्वमेध यज्ञ के अंत में इस राजा का सम्मान करते हैं।
पदच्छेदः
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| विन्ध्यस्य | विन्ध्य (६.१) | of Vindhya |
| संस्तम्भयिता | संस्तम्भयितृ (सम्√स्तम्भ्+णिच्+तृच्, १.१) | the stopper |
| महाद्रेः | महा–अद्रि (६.१) | of the great mountain |
| निःशेषपीतोज्झितसिन्धुराजः | निःशेष–पीत–उज्झित–सिन्धु–राज (१.१) | he by whom the king of rivers (ocean) was completely drunk and then released |
| प्रीत्या | प्रीति (३.१) | out of affection |
| अश्वमेधावभृथार्द्रमूर्तेः | अश्वमेध–अवभृथ–आर्द्र–मूर्ति (६.१) | of him whose head is wet from the purificatory bath of the Ashvamedha sacrifice |
| सौस्नातिकः | सौस्नातिक (१.१) | one who performs the post-ritual bath ceremony |
| यस्य | यद् (६.१) | whose |
| भवति | भवति (√भू कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | becomes |
| अगस्त्यः | अगस्त्य (१.१) | Agastya |
छन्दः
इन्द्रवज्रा [११: ततजगग]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | न्ध्य | स्य | सं | स्त | म्भ | यि | ता | म | हा | द्रे |
| र्निः | शे | ष | पी | तो | ज्झि | त | सि | न्धु | रा | जः |
| प्री | त्या | श्व | मे | धा | व | भृ | था | र्द्र | मू | र्तेः |
| सौ | स्ना | ति | को | य | स्य | भ | व | त्य | ग | स्त्यः |
| त | त | ज | ग | ग | ||||||
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