अग्निकल्पो हि भगवाञ्शापं दास्यति रोषितः ।
तस्मात्प्रवर्त्यतां यज्ञः सशरीरो यथा दिवम् ।
गच्छेदिक्ष्वाकुदायादो विश्वामित्रस्य तेजसा ॥
अग्निकल्पो हि भगवाञ्शापं दास्यति रोषितः ।
तस्मात्प्रवर्त्यतां यज्ञः सशरीरो यथा दिवम् ।
गच्छेदिक्ष्वाकुदायादो विश्वामित्रस्य तेजसा ॥
अन्वयः
तस्मात् for that reason, यज्ञ: sacrifice, प्रवर्त्यताम् be performed, इक्ष्वाकुदायाद: descendent of Ikshvaku, विश्वामित्रस्य Visvamitra's, तेजसा by spiritual power, सशरीर: with his physical frame, यथा in whatever manner, दिवम् heaven, गच्छेत् may attain, तथा in that manner, यज्ञ: sacrifice, प्रवर्त्यताम् may be performed, सर्वे all, समधितिष्ठत commence.Summary
Hence let the sacrifice be performed in such a manner that the descendant of the Ikshvakus would attain heaven with his physical body through the spiritual power of Viswamitra. All of you commence the sacrifice".पदच्छेदः
| अग्निकल्पो | अग्नि–कल्प (१.१) |
| हि | हि (अव्ययः) |
| भगवाञ् | भगवत् (१.१) |
| शापं | शाप (२.१) |
| दास्यति | दास्यति (√दा लृट् प्र.पु. एक.) |
| रोषितः | रोषित (√रोषय् + क्त, १.१) |
| तस्मात् | तस्मात् (अव्ययः) |
| प्रवर्त्यतां | प्रवर्त्यताम् (√प्र-वर्तय् प्र.पु. एक.) |
| यज्ञः | यज्ञ (१.१) |
| सशरीरो | स (अव्ययः)–शरीर (१.१) |
| यथा | यथा (अव्ययः) |
| दिवम् | दिव् (२.१) |
| गच्छेद् | गच्छेत् (√गम् विधिलिङ् प्र.पु. एक.) |
| इक्ष्वाकुदायादो | इक्ष्वाकु–दायाद (१.१) |
| विश्वामित्रस्य | विश्वामित्र (६.१) |
| तेजसा | तेजस् (३.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | ग्नि | क | ल्पो | हि | भ | ग | वा | ञ्शा | पं | दा | स्य |
| ति | रो | षि | तः | त | स्मा | त्प्र | व | र्त्य | तां | य | ज्ञः |
| स | श | री | रो | य | था | दि | वम् | ग | च्छे | दि | क्ष्वा |
| कु | दा | या | दो | वि | श्वा | मि | त्र | स्य | ते | ज | सा |