अन्वयः
मुनिपुङ्गव: eminent ascetic, कुशिकात्मज: son of Kusika, सहस्राक्षस्य Indra's, तत् that one, कर्म work, विज्ञाय having recognised, क्रोधसमाविष्ट: seized of anger, रम्भाम् Rambha, शशाप cursed.
Summary
Son of Kushika, the eminent ascetic knew it was the work of Indra. Seized with anger, he cursed Rambha:
पदच्छेदः
| सहस्राक्षस्य | सहस्राक्ष (६.१) |
| तत् | तद् (२.१) |
| कर्म | कर्मन् (२.१) |
| विज्ञाय | विज्ञाय (√वि-ज्ञा + ल्यप्) |
| मुनिपुंगवः | मुनि–पुंगव (१.१) |
| रम्भां | रम्भा (२.१) |
| क्रोधसमाविष्टः | क्रोध–समाविष्ट (√समा-विश् + क्त, १.१) |
| शशाप | शशाप (√शप् लिट् प्र.पु. एक.) |
| कुशिकात्मजः | कुशिक–आत्मज (१.१) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| स | ह | स्रा | क्ष | स्य | त | त्क | र्म |
| वि | ज्ञा | य | मु | नि | पुं | ग | वः |
| र | म्भां | क्रो | ध | स | मा | वि | ष्टः |
| श | शा | प | कु | शि | का | त्म | जः |