क्रुद्धमाज्ञाय रामं तु वसिष्ठः प्रत्युवाच ह ।
जाबालिरपि जानीते लोकस्यास्य गतागतिम् ।
निवर्तयितुकामस्तु त्वामेतद्वाक्यमब्रवीत् ॥
क्रुद्धमाज्ञाय रामं तु वसिष्ठः प्रत्युवाच ह ।
जाबालिरपि जानीते लोकस्यास्य गतागतिम् ।
निवर्तयितुकामस्तु त्वामेतद्वाक्यमब्रवीत् ॥
अन्वयः
रामम् Rama, क्रुद्धम् as wrathful, आज्ञाय having perceived, वसिष्ठः Vasistha, प्रत्युवाच ह intercedes, जाबालिरपि Jabali also, अस्य लोकस्य to this world, गतागतिम् exits and entrances, जानीते is aware.Summary
Seeing Rama angry Vasistha intercedes, saying that Jabali is wellaware of the exits and entrances of humans on earth.पदच्छेदः
| क्रुद्धम् | क्रुद्ध (√क्रुध् + क्त, २.१) |
| आज्ञाय | आज्ञाय (√आ-ज्ञा + ल्यप्) |
| रामं | राम (२.१) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| वसिष्ठः | वसिष्ठ (१.१) |
| प्रत्युवाच | प्रत्युवाच (√प्रति-वच् लिट् प्र.पु. एक.) |
| ह | ह (अव्ययः) |
| जाबालिर् | जाबालि (१.१) |
| अपि | अपि (अव्ययः) |
| जानीते | जानीते (√ज्ञा लट् प्र.पु. एक.) |
| लोकस्यास्य | लोक (६.१)–इदम् (६.१) |
| गतागतिम् | गतागति (२.१) |
| निवर्तयितुकामस् | निवर्तयितु–काम (१.१) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| त्वाम् | त्वद् (२.१) |
| एतद् | एतद् (२.१) |
| वाक्यम् | वाक्य (२.१) |
| अब्रवीत् | अब्रवीत् (√ब्रू लङ् प्र.पु. एक.) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क्रु | द्ध | मा | ज्ञा | य | रा | मं | तु | व | सि | ष्ठः | प्र |
| त्यु | वा | च | ह | जा | बा | लि | र | पि | जा | नी | ते |
| लो | क | स्या | स्य | ग | ता | ग | तिम् | नि | व | र्त | यि |
| तु | का | म | स्तु | त्वा | मे | त | द्वा | क्य | म | ब्र | वीत् |