लोकविद्विष्टमारब्धं त्वदन्यस्याभिषेचनम् ।
येनेयमागता द्वैधं तव बुद्धिर्महीपते ।
स हि धर्मो मम द्वेष्यः प्रसङ्गाद्यस्य मुह्यसि ॥
लोकविद्विष्टमारब्धं त्वदन्यस्याभिषेचनम् ।
येनेयमागता द्वैधं तव बुद्धिर्महीपते ।
स हि धर्मो मम द्वेष्यः प्रसङ्गाद्यस्य मुह्यसि ॥
अन्वयः
महामते O nobleminded one, येन by which, तव your, (इदम् this), बुद्धि: intellect, द्वैधम् dilemma, आगता attained, यस्य whose, प्रसङ्गात् concern, मुह्यसि you are deluded, सः धर्मः that righteousness, मम to me, द्वेष्यः deserve to be hated.M N Dutt
Even that so called virtue do I loathe, which has, O high-souled one, fascinated you, and made your mind run from one extreme to another. *Formerly the mind was for accepting the kingdom, and now for going to the forest as an exile. These are the two extremes here meant.Summary
O noble minded one I hate this righteousness which has deluded your intellect and created this dilemma about this issue.पदच्छेदः
| लोकविद्विष्टम् | लोक–विद्विष्ट (√वि-द्विष् + क्त, १.१) |
| आरब्धं | आरब्ध (√आ-रभ् + क्त, १.१) |
| त्वदन्यस्याभिषेचनम् | त्वद्–अन्य (६.१)–अभिषेचन (१.१) |
| येनेयम् | यद् (३.१)–इदम् (१.१) |
| आगता | आगत (√आ-गम् + क्त, १.१) |
| द्वैधं | द्वैध (२.१) |
| तव | त्वद् (६.१) |
| बुद्धिर् | बुद्धि (१.१) |
| महीपते | महीपति (८.१) |
| स | तद् (१.१) |
| हि | हि (अव्ययः) |
| धर्मो | धर्म (१.१) |
| मम | मद् (६.१) |
| द्वेष्यः | द्वेष्य (√द्विष् + कृत्, १.१) |
| प्रसङ्गाद् | प्रसङ्ग (५.१) |
| यस्य | यद् (६.१) |
| मुह्यसि | मुह्यसि (√मुह् लट् म.पु. ) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| लो | क | वि | द्वि | ष्ट | मा | र | ब्धं | त्व | द | न्य | स्या |
| भि | षे | च | नम् | ये | ने | य | मा | ग | ता | द्वै | धं |
| त | व | बु | द्धि | र्म | ही | प | ते | स | हि | ध | र्मो |
| म | म | द्वे | ष्यः | प्र | स | ङ्गा | द्य | स्य | मु | ह्य | सि |