फलानि मूलानि च भक्षयन्वने; गिरींश्च पश्यन्सरितः सरांसि च ।
वनं प्रविश्यैव विचित्रपादपं; सुखी भविष्यामि तवास्तु निर्वृतिः ॥
फलानि मूलानि च भक्षयन्वने; गिरींश्च पश्यन्सरितः सरांसि च ।
वनं प्रविश्यैव विचित्रपादपं; सुखी भविष्यामि तवास्तु निर्वृतिः ॥
अन्वयः
विचित्रपादपम् with various kinds of trees, वनम् the forest, प्रविश्यैव having entered, फलानि fruits, मूलानि च roots also, भक्षयन् eating, वने in the forest, गिरींश्च mountains as well, सरितः rivers, सरांसि च lakes, पश्यन् seeing, सुखी भविष्यामि shall be happy, तव you, निर्वृतिः अस्तु shall cease (to lament).Summary
Entering the forest full of various kinds of trees I shall be happy to view the mountains, rivers and the lakes and to eat fruits and roots. (Hence) do not grieve.पदच्छेदः
| फलानि | फल (२.३) |
| मूलानि | मूल (२.३) |
| च | च (अव्ययः) |
| भक्षयन् | भक्षयत् (√भक्षय् + शतृ, १.१) |
| वने | वन (७.१) |
| गिरींश् | गिरि (२.३) |
| च | च (अव्ययः) |
| पश्यन् | पश्यत् (√दृश् + शतृ, १.१) |
| सरितः | सरित् (२.३) |
| सरांसि | सरस् (२.३) |
| च | च (अव्ययः) |
| वनं | वन (२.१) |
| प्रविश्यैव | प्रविश्य (√प्र-विश् + ल्यप्)–एव (अव्ययः) |
| विचित्रपादपं | विचित्र–पादप (२.१) |
| सुखी | सुखिन् (१.१) |
| भविष्यामि | भविष्यामि (√भू लृट् उ.पु. ) |
| तवास्तु | त्वद् (६.१)–अस्तु (√अस् लोट् प्र.पु. एक.) |
| निर्वृतिः | निर्वृति (१.१) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| फ | ला | नि | मू | ला | नि | च | भ | क्ष | य | न्व | ने |
| गि | रीं | श्च | प | श्य | न्स | रि | तः | स | रां | सि | च |
| व | नं | प्र | वि | श्यै | व | वि | चि | त्र | पा | द | पं |
| सु | खी | भ | वि | ष्या | मि | त | वा | स्तु | नि | र्वृ | तिः |
| ज | त | ज | र | ||||||||