एकस्याः खलु कैकेय्याः कृतेऽयं क्लिश्यते जनः ।
स्वार्थे प्रयतमानायाः संश्रित्य निकृतिं त्विमाम् ॥
एकस्याः खलु कैकेय्याः कृतेऽयं क्लिश्यते जनः ।
स्वार्थे प्रयतमानायाः संश्रित्य निकृतिं त्विमाम् ॥
अन्वयः
इमाम् this, निकृतिम् deception, संश्रित्य resorting to, स्वार्थे for selfish ends, प्रयतमानायाः in pursuit of, एकस्याः only one, कैकेय्याः कृतेः for Kaikeyi, अयं जनः these people, क्लिश्यते are suffering.Summary
Only because of Kaikeyi who resorted to this deception in pursuit of selfish ends so many people are made to suffer.पदच्छेदः
| एकस्याः | एक (६.१) |
| खलु | खलु (अव्ययः) |
| कैकेय्याः | कैकेयी (६.१) |
| कृते | कृत (७.१) |
| ऽयं | इदम् (१.१) |
| क्लिश्यते | क्लिश्यते (√क्लिश् लट् प्र.पु. एक.) |
| जनः | जन (१.१) |
| स्वार्थे | स्व–अर्थ (७.१) |
| प्रयतमानायाः | प्रयतमान (√प्र-यत् + शानच्, ६.१) |
| संश्रित्य | संश्रित्य (√सम्-श्रि + ल्यप्) |
| निकृतिं | निकृति (२.१) |
| त्व् | तु (अव्ययः) |
| इमाम् | इदम् (२.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ए | क | स्याः | ख | लु | कै | के | य्याः |
| कृ | ते | ऽयं | क्लि | श्य | ते | ज | नः |
| स्वा | र्थे | प्र | य | त | मा | ना | याः |
| सं | श्रि | त्य | नि | कृ | तिं | त्वि | माम् |