अनुत्तमं तद्वचनं नृपात्मज; प्रभाषितं संश्रवणे निशम्य च ।
प्रहर्षजास्तं प्रति बाष्पबिन्दवो; निपेतुरार्यानननेत्रसंभवाः ॥
अनुत्तमं तद्वचनं नृपात्मज; प्रभाषितं संश्रवणे निशम्य च ।
प्रहर्षजास्तं प्रति बाष्पबिन्दवो; निपेतुरार्यानननेत्रसंभवाः ॥
अन्वयः
संश्रवणे within hearing range, नृपात्मजप्रभाषितम् spoken by the king's son, अनुत्तमम् graceful, तत् वचनम् that speech, निशम्य च having heard, तं प्रति to him, प्रहर्षजाः born of joy, आर्यानननेत्रसम्भवाः arising from the eyes and countenances of noble ones, बाष्पबिन्दवः drops of tears, निपेतुः trickled down.M N Dutt
Hearing that graceful speech of the king's son, tear-drops. begot of delight began to trickle from their eyes and adorned those noble countenances.Summary
With such graceful words spoken by the prince within their hearing, tears of joy filled the eyes of the noble people and fell drop by drop down their faces.पदच्छेदः
| अनुत्तमं | अनुत्तम (१.१) |
| तद् | तद् (१.१) |
| वचनं | वचन (१.१) |
| नृपात्मज | नृप–आत्मज (८.१) |
| प्रभाषितं | प्रभाषित (√प्र-भाष् + क्त, १.१) |
| संश्रवणे | संश्रवण (७.१) |
| निशम्य | निशम्य (√नि-शामय् + ल्यप्) |
| च | च (अव्ययः) |
| प्रहर्षजास् | प्रहर्ष–ज (१.३) |
| तं | तद् (२.१) |
| प्रति | प्रति (अव्ययः) |
| बाष्पबिन्दवो | बाष्प–बिन्दु (१.३) |
| निपेतुर् | निपेतुः (√नि-पत् लिट् प्र.पु. बहु.) |
| आर्यानननेत्रसम्भवाः | आर्य–आनन–नेत्र–सम्भव (१.३) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | नु | त्त | मं | त | द्व | च | नं | नृ | पा | त्म | ज |
| प्र | भा | षि | तं | सं | श्र | व | णे | नि | श | म्य | च |
| प्र | ह | र्ष | जा | स्तं | प्र | ति | बा | ष्प | बि | न्द | वो |
| नि | पे | तु | रा | र्या | न | न | ने | त्र | सं | भ | वाः |
| ज | त | ज | र | ||||||||