पदच्छेदः
| कच्चिच् | कच्चित् (अव्ययः) |
| चैत्यशतैर् | चैत्य–शत (३.३) |
| जुष्टः | जुष्ट (√जुष् + क्त, १.१) |
| सुनिविष्टजनाकुलः | सु (अव्ययः)–निविष्ट (√नि-विश् + क्त)–जन–आकुल (१.१) |
| देवस्थानैः | देव–स्थान (३.३) |
| प्रपाभिश् | प्रपा (३.३) |
| च | च (अव्ययः) |
| तडागैश् | तडाग (३.३) |
| चोपशोभितः | च (अव्ययः)–उपशोभित (√उप-शोभय् + क्त, १.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| क | च्चि | च्चै | त्य | श | तै | र्जु | ष्टः |
| सु | नि | वि | ष्ट | ज | ना | कु | लः |
| दे | व | स्था | नैः | प्र | पा | भि | श्च |
| त | डा | गै | श्चो | प | शो | भि | तः |