किमेष वाक्यं भरतोऽद्य राघवं; प्रणम्य सत्कृत्य च साधु वक्ष्यति ।
इतीव तस्यार्यजनस्य तत्त्वतो; बभूव कौतूहलमुत्तमं तदा ॥
किमेष वाक्यं भरतोऽद्य राघवं; प्रणम्य सत्कृत्य च साधु वक्ष्यति ।
इतीव तस्यार्यजनस्य तत्त्वतो; बभूव कौतूहलमुत्तमं तदा ॥
अन्वयः
एषः this, भरतः Bharata, अद्य now, राघवम् to Rama, प्रणम्य having paid his homage, सत्कृत्य च also honouring him, साधु of good, किं वाक्यम् what words, वक्ष्यति will speak, इतीव thus as if, तदा of that, तस्य those, आर्यजनस्य of nobility, तत्त्वतः truly, उत्तमम् great, कौतूहलम् curiosity, बभूव arose.Summary
All noble people were truly filled with great curiosity as to what Bharata was going to speak, after paying his homage and honouring Rama.पदच्छेदः
| किम् | क (२.१) |
| एष | एतद् (१.१) |
| वाक्यं | वाक्य (२.१) |
| भरतो | भरत (१.१) |
| ऽद्य | अद्य (अव्ययः) |
| राघवं | राघव (२.१) |
| प्रणम्य | प्रणम्य (√प्र-नम् + ल्यप्) |
| सत्कृत्य | सत्कृत्य (√सत्-कृ + ल्यप्) |
| च | च (अव्ययः) |
| साधु | साधु (२.१) |
| वक्ष्यति | वक्ष्यति (√वच् लृट् प्र.पु. एक.) |
| इतीव | इति (अव्ययः)–इव (अव्ययः) |
| तस्यार्यजनस्य | तद् (६.१)–आर्य–जन (६.१) |
| तत्त्वतो | तत्त्व (५.१) |
| बभूव | बभूव (√भू लिट् प्र.पु. एक.) |
| कौतूहलम् | कौतूहल (१.१) |
| उत्तमं | उत्तम (१.१) |
| तदा | तदा (अव्ययः) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कि | मे | ष | वा | क्यं | भ | र | तो | ऽद्य | रा | घ | वं |
| प्र | ण | म्य | स | त्कृ | त्य | च | सा | धु | व | क्ष्य | ति |
| इ | ती | व | त | स्या | र्य | ज | न | स्य | त | त्त्व | तो |
| ब | भू | व | कौ | तू | ह | ल | मु | त्त | मं | त | दा |
| ज | त | ज | र | ||||||||