पदच्छेदः
| भूमीगृहांश् | भूमिगृह (२.३) |
| चैत्यगृहान् | चैत्य–गृह (२.३) |
| गृहातिगृहकान् | गृह–अतिगृहक (२.३) |
| अपि | अपि (अव्ययः) |
| उत्पतन्निपतंश्चापि | उत्पतत् (√उत्-पत् + शतृ, १.१)–निपतत् (√नि-पत् + शतृ, १.१)–च (अव्ययः)–अपि (अव्ययः) |
| तिष्ठन् | तिष्ठत् (√स्था + शतृ, १.१) |
| गच्छन् | गच्छत् (√गम् + शतृ, १.१) |
| पुनः | पुनर् (अव्ययः) |
| क्वचित् | क्वचिद् (अव्ययः) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| भू | मी | गृ | हां | श्चै | त्य | गृ | हा |
| न्गृ | हा | ति | गृ | ह | का | न | पि |
| उ | त्प | त | न्नि | प | तं | श्चा | पि |
| ति | ष्ठ | न्ग | च्छ | न्पु | नः | क्व | चित् |