इति स बहुविधं महानुभावो; जगतिपतेः प्रमदामवेक्षमाणः ।
मधुरमवितथं जगाद वाक्यं; द्रुमविटपान्तरमास्थितो हनूमान् ॥
इति स बहुविधं महानुभावो; जगतिपतेः प्रमदामवेक्षमाणः ।
मधुरमवितथं जगाद वाक्यं; द्रुमविटपान्तरमास्थितो हनूमान् ॥
अन्वयः
महानुभावः magnanimous, सः हनूमान् that Hanuman, द्रुमविटपान्तरम् behind the branch of the tree, आस्थितः seated, जगतिपतेः of the lord of the universe, प्रमदाम् wife, अवेक्षमाणः seeing, बहुविधम् in many ways, अवितथम् faithful, वाक्यम् words, इति thus, जगाद spokeM N Dutt
Beholding the spouse of that high-souled lord of the earth and engaging in this train of thoughts, Hanumān, stationed on a branch of the tree, spoke the following sweet words.Summary
Highsouled Hanuman seated on the branch of the tree without being seen began to speak faithfully in praise of the lord of the universe in many ways while looking at her. इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये सुन्दरकाण्डे त्रिंशस्सर्गः॥Thus ends the thirtieth sarga of Sundarakanda of the holy Ramayana, the first epic composed by sage Valmiki.पदच्छेदः
| इति | इति (अव्ययः) |
| स | तद् (१.१) |
| बहुविधं | बहुविध (२.१) |
| महानुभावो | महत्–अनुभाव (१.१) |
| जगतिपतेः | जगतिपति (६.१) |
| प्रमदाम् | प्रमदा (२.१) |
| अवेक्षमाणः | अवेक्षमाण (√अव-ईक्ष् + शानच्, १.१) |
| मधुरम् | मधुर (२.१) |
| अवितथं | अवितथ (२.१) |
| जगाद | जगाद (√गद् लिट् प्र.पु. एक.) |
| वाक्यं | वाक्य (२.१) |
| द्रुमविटपान्तरम् | द्रुम–विटप–अन्तर (२.१) |
| आस्थितो | आस्थित (√आ-स्था + क्त, १.१) |
| हनूमान् | हनुमन्त् (१.१) |
छन्दः
पुष्पिताग्रा []छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ | १३ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| इ | ति | स | ब | हु | वि | धं | म | हा | नु | भा | वो | |
| ज | ग | ति | प | तेः | प्र | म | दा | म | वे | क्ष | मा | णः |
| म | धु | र | म | वि | त | थं | ज | गा | द | वा | क्यं | |
| द्रु | म | वि | ट | पा | न्त | र | मा | स्थि | तो | ह | नू | मान् |