तस्य तद्वचनं श्रुत्वा संपातेः प्रीतिवर्धनम् ।
अङ्गदप्रमुखाः सर्वे ततः संप्रस्थिता वयम् ।
त्वद्दर्शनकृतोत्साहा हृष्टास्तुष्टाः प्लवंगमाः ॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा संपातेः प्रीतिवर्धनम् ।
अङ्गदप्रमुखाः सर्वे ततः संप्रस्थिता वयम् ।
त्वद्दर्शनकृतोत्साहा हृष्टास्तुष्टाः प्लवंगमाः ॥
अन्वयः
तस्य his, सम्पातेः Samapati's, प्रीतिवर्धनम् that which was pleasing, तत् that, वचनम् word, श्रुत्वा having heard, अङ्गदप्रमुखाः Angada and others, वयम् all of us, तूर्णम् quickly, ततः from there, प्रस्थिताः departed.M N Dutt
Hearing those words of Sampāti, enhancing our delight, we all, headed by Angada, left that place. And leaping from the crest of Vindhya mountain we reached the excellent brink of the Ocean. Being greatly anxious to behold you and delighted, those plump monkeys headed by Angada, arrived at the banks of the main.Summary
"Having heard Sampati's encouraging words all of us led by Angada departed immediately.पदच्छेदः
| तस्य | तद् (६.१) |
| तद्वचनं | तद् (२.१)–वचन (२.१) |
| श्रुत्वा | श्रुत्वा (√श्रु + क्त्वा) |
| संपातेः | सम्पाति (६.१) |
| प्रीतिवर्धनम् | प्रीति–वर्धन (२.१) |
| अङ्गदप्रमुखाः | अङ्गद–प्रमुख (१.३) |
| सर्वे | सर्व (१.३) |
| ततः | ततस् (अव्ययः) |
| सम्प्रस्थिता | सम्प्रस्थित (√सम्प्र-स्था + क्त, १.३) |
| वयम् | मद् (१.३) |
| त्वद्दर्शनकृतोत्साहा | त्वद्–दर्शन–कृत (√कृ + क्त)–उत्साह (१.३) |
| हृष्टास्तुष्टाः | हृष्ट (√हृष् + क्त, १.३)–तुष्ट (√तुष् + क्त, १.३) |
| प्लवंगमाः | प्लवंगम (१.३) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | स्य | त | द्व | च | नं | श्रु | त्वा | सं | पा | तेः | प्री |
| ति | व | र्ध | नम् | अ | ङ्ग | द | प्र | मु | खाः | स | र्वे |
| त | तः | सं | प्र | स्थि | ता | व | यम् | त्व | द्द | र्श | न |
| कृ | तो | त्सा | हा | हृ | ष्टा | स्तु | ष्टाः | प्ल | वं | ग | माः |