समीक्ष्य तं संयति चित्रकार्मुकं; महाबलं वासवतुल्यविक्रमम् ।
सलक्ष्मणं को विषहेत राघवं; हुताशनं दीप्तमिवानिलेरितम् ॥
समीक्ष्य तं संयति चित्रकार्मुकं; महाबलं वासवतुल्यविक्रमम् ।
सलक्ष्मणं को विषहेत राघवं; हुताशनं दीप्तमिवानिलेरितम् ॥
अन्वयः
चित्रकार्मुकम् wielder of a powerful bow, महाबलम् endowed with great strength, वासवतुल्यविक्रमम् equal to Vasava in valour, सलक्ष्मणम् along with Lakshmana, अनिलेरितम् whipped by wind, दीप्तम् blazing, हुताशनमिव like the fire, तं राघवम् him, Rama, सयति in war, समीक्ष्य facing, कः who, विषहेतः can withstand.M N Dutt
Beholding that highly powerful Rāghava, in a conflict, like to Vāsava in prowess, holding a wonderful bow and followed by Lakşmaņa, who can withstand his prowess resembling the flaming fire?पदच्छेदः
| समीक्ष्य | समीक्ष्य (√सम्-ईक्ष् + ल्यप्) |
| तं | तद् (२.१) |
| संयति | संयत् (७.१) |
| चित्रकार्मुकं | चित्र–कार्मुक (२.१) |
| महाबलं | महत्–बल (२.१) |
| वासवतुल्यविक्रमम् | वासव–तुल्य–विक्रम (२.१) |
| सलक्ष्मणं | स (अव्ययः)–लक्ष्मण (२.१) |
| को | क (१.१) |
| विषहेत | विषहेत (√वि-सह् विधिलिङ् प्र.पु. एक.) |
| राघवं | राघव (२.१) |
| हुताशनं | हुताशन (२.१) |
| दीप्तम् | दीप्त (√दीप् + क्त, २.१) |
| इवानिलेरितम् | इव (अव्ययः)–अनिल–ईरित (√ईरय् + क्त, २.१) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | मी | क्ष्य | तं | सं | य | ति | चि | त्र | का | र्मु | कं |
| म | हा | ब | लं | वा | स | व | तु | ल्य | वि | क्र | मम् |
| स | ल | क्ष्म | णं | को | वि | ष | हे | त | रा | घ | वं |
| हु | ता | श | नं | दी | प्त | मि | वा | नि | ले | रि | तम् |
| ज | त | ज | र | ||||||||