विनष्टे वा प्रनष्टे वा शोकः सर्वार्थनाशनः ।
त्वं तु बुद्धिमतां श्रेष्ठः सर्वशास्त्रार्थकोविदः ॥
विनष्टे वा प्रनष्टे वा शोकः सर्वार्थनाशनः ।
त्वं तु बुद्धिमतां श्रेष्ठः सर्वशास्त्रार्थकोविदः ॥
पदच्छेदः
| विनष्टे | विनष्ट (√वि-नश् + क्त, ७.१) |
| वा | वा (अव्ययः) |
| प्रनष्टे | प्रनष्ट (√प्र-नश् + क्त, ७.१) |
| वा | वा (अव्ययः) |
| शोकः | शोक (१.१) |
| सर्वार्थनाशनः | सर्व–अर्थ–नाशन (१.१) |
| त्वं | त्वद् (१.१) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| बुद्धिमतां | बुद्धिमत् (६.३) |
| श्रेष्ठः | श्रेष्ठ (१.१) |
| सर्वशास्त्रार्थकोविदः | सर्व–शास्त्र–अर्थ–कोविद (१.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| वि | न | ष्टे | वा | प्र | न | ष्टे | वा |
| शो | कः | स | र्वा | र्थ | ना | श | नः |
| त्वं | तु | बु | द्धि | म | तां | श्रे | ष्ठः |
| स | र्व | शा | स्त्रा | र्थ | को | वि | दः |