ईदृशे व्यसने प्राप्ते यो न साह्याय कल्पते ।
ते तु तद्वचनं श्रुत्वा राक्षसेन्द्रस्य राक्षसाः ॥
ईदृशे व्यसने प्राप्ते यो न साह्याय कल्पते ।
ते तु तद्वचनं श्रुत्वा राक्षसेन्द्रस्य राक्षसाः ॥
पदच्छेदः
| ईदृशे | ईदृश (७.१) |
| व्यसने | व्यसन (७.१) |
| प्राप्ते | प्राप्त (√प्र-आप् + क्त, ७.१) |
| यो | यद् (१.१) |
| न | न (अव्ययः) |
| साह्याय | साह्य (४.१) |
| कल्पते | कल्पते (√क्ᄆप् लट् प्र.पु. एक.) |
| ते | तद् (१.३) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| तद्वचनं | तद्–वचन (२.१) |
| श्रुत्वा | श्रुत्वा (√श्रु + क्त्वा) |
| राक्षसेन्द्रस्य | राक्षस–इन्द्र (६.१) |
| राक्षसाः | राक्षस (१.३) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ई | दृ | शे | व्य | स | ने | प्रा | प्ते |
| यो | न | सा | ह्या | य | क | ल्प | ते |
| ते | तु | त | द्व | च | नं | श्रु | त्वा |
| रा | क्ष | से | न्द्र | स्य | रा | क्ष | साः |