प्रासैः शूलैः शितैर्बाणैरिन्द्रजिन्मन्त्रसंहितैः ।
विव्याध हरिशार्दूलान्सर्वांस्तान्राक्षसोत्तमः ॥
प्रासैः शूलैः शितैर्बाणैरिन्द्रजिन्मन्त्रसंहितैः ।
विव्याध हरिशार्दूलान्सर्वांस्तान्राक्षसोत्तमः ॥
पदच्छेदः
| प्रासैः | प्रास (३.३) |
| शूलैः | शूल (३.३) |
| शितैर् | शित (√शा + क्त, ३.३) |
| बाणैर् | बाण (३.३) |
| इन्द्रजिन्मन्त्रसंहितैः | इन्द्रजित् (१.१)–मन्त्र–संहित (√सम्-धा + क्त, ३.३) |
| विव्याध | विव्याध (√व्यध् लिट् प्र.पु. एक.) |
| हरिशार्दूलान् | हरि–शार्दूल (२.३) |
| सर्वांस्तान् | सर्व (२.३)–तद् (२.३) |
| राक्षसोत्तमः | राक्षस–उत्तम (१.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प्रा | सैः | शू | लैः | शि | तै | र्बा | णै |
| रि | न्द्र | जि | न्म | न्त्र | सं | हि | तैः |
| वि | व्या | ध | ह | रि | शा | र्दू | ला |
| न्स | र्वां | स्ता | न्रा | क्ष | सो | त्त | मः |