स वै गदाभिर्हरियूथमुख्या;न्निर्भिद्य बाणैस्तपनीयपुङ्खैः ।
ववर्ष रामं शरवृष्टिजालैः; सलक्ष्मणं भास्कररश्मिकल्पैः ॥
स वै गदाभिर्हरियूथमुख्या;न्निर्भिद्य बाणैस्तपनीयपुङ्खैः ।
ववर्ष रामं शरवृष्टिजालैः; सलक्ष्मणं भास्कररश्मिकल्पैः ॥
अन्वयः
सः he, गदाभिः maces, तपनीयवङ्खैः arrows shining with golden colour, बाणैः arrows, हरियूथमुख्यान् leaders of Vanara troops, निर्भिद्य wounded, सलक्ष्मणम् Lakshmana, रामम् Rama, भास्कररमशिकल्पैः shining like Sun 's rays, शरवृष्टिजालैः volley of arrows, ववर्ष rained.M N Dutt
Having pierced those foremost monkeys with golden-hued maces, he showered on Rāma and Lakşmaņa arrows resembling the rays of the sun.Summary
Having hurt the Vanara leaders with maces and arrows shining like gold, he rained volley of arrows shining like sun rays on Lakshmana and Rama.पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| वै | वै (अव्ययः) |
| गदाभिर् | गदा (३.३) |
| हरियूथमुख्यान् | हरि–यूथ–मुख्य (२.३) |
| निर्भिद्य | निर्भिद्य (√निः-भिद् + ल्यप्) |
| बाणैस्तपनीयपुङ्खैः | बाण (३.३)–तपनीय–पुङ्ख (३.३) |
| ववर्ष | ववर्ष (√वृष् लिट् प्र.पु. एक.) |
| रामं | राम (२.१) |
| शरवृष्टिजालैः | शर–वृष्टि–जाल (३.३) |
| सलक्ष्मणं | स (अव्ययः)–लक्ष्मण (२.१) |
| भास्कररश्मिकल्पैः | भास्कर–रश्मि–कल्प (३.३) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | वै | ग | दा | भि | र्ह | रि | यू | थ | मु | ख्या |
| न्नि | र्भि | द्य | बा | णै | स्त | प | नी | य | पु | ङ्खैः |
| व | व | र्ष | रा | मं | श | र | वृ | ष्टि | जा | लैः |
| स | ल | क्ष्म | णं | भा | स्क | र | र | श्मि | क | ल्पैः |