पदच्छेदः
| अभिजघ्नुः | अभिजघ्नुः (√अभि-हन् लिट् प्र.पु. बहु.) |
| समासाद्य | समासाद्य (√समा-सादय् + ल्यप्) |
| समन्तात् | समन्तात् (अव्ययः) |
| पर्वतोपमम् | पर्वत–उपम (२.१) |
| तेषाम् | तद् (६.३) |
| अपि | अपि (अव्ययः) |
| च | च (अव्ययः) |
| संक्रुद्धश्चकार | संक्रुद्ध (√सम्-क्रुध् + क्त, १.१)–चकार (√कृ लिट् प्र.पु. एक.) |
| कदनं | कदन (२.१) |
| महत् | महत् (२.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | भि | ज | घ्नुः | स | मा | सा | द्य |
| स | म | न्ता | त्प | र्व | तो | प | मम् |
| ते | षा | म | पि | च | सं | क्रु | द्ध |
| श्च | का | र | क | द | नं | म | हत् |