चापवेगप्रमुक्तैश्च बाणजालैः समन्ततः ।
अन्तरिक्षेऽभिसंछन्ने न रूपाणि चकाशिरे ।
तमसा पिहितं सर्वमासीद्भीमतरं महत् ॥
चापवेगप्रमुक्तैश्च बाणजालैः समन्ततः ।
अन्तरिक्षेऽभिसंछन्ने न रूपाणि चकाशिरे ।
तमसा पिहितं सर्वमासीद्भीमतरं महत् ॥
अन्वयः
चापवेगप्रयुक्स्सैः discharging from the bow swiftly, बाणजालैः net of arrows, समन्ततः all over, अन्तरिक्षे the sky, अभिसम्पन्ने covered, रूपाणि object, न चकाशिरे could be seenM N Dutt
In consequence of the sky being covered with networks of arrows all around, discharged powerfully from their bows, the forms (of objects) could not be discovered.Summary
As they were discharging arrows from the bow swiftly, the arrows formed a net covering all over the sky and no object could be visible.पदच्छेदः
| चापवेगप्रमुक्तैश्च | चाप–वेग–प्रमुक्त (√प्र-मुच् + क्त, ३.३)–च (अव्ययः) |
| बाणजालैः | बाण–जाल (३.३) |
| समन्ततः | समन्ततः (अव्ययः) |
| अन्तरिक्षे | अन्तरिक्ष (७.१) |
| ऽभिसंछन्ने | अभिसंछन्न (√अभिसम्-छद् + क्त, ७.१) |
| न | न (अव्ययः) |
| रूपाणि | रूप (१.३) |
| चकाशिरे | चकाशिरे (√काश् लिट् प्र.पु. बहु.) |
| तमसा | तमस् (३.१) |
| पिहितं | पिहित (√पि-धा + क्त, १.१) |
| सर्वम् | सर्व (१.१) |
| आसीद् | आसीत् (√अस् लङ् प्र.पु. एक.) |
| भीमतरं | भीमतर (१.१) |
| महत् | महत् (१.१) |
छन्दः
उपजातिः [११]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| चा | प | वे | ग | प्र | मु | क्तै | श्च | बा | ण | जा | लैः |
| स | म | न्त | तः | अ | न्त | रि | क्षे | ऽभि | सं | छ | न्ने |
| न | रू | पा | णि | च | का | शि | रे | त | म | सा | पि |
| हि | तं | स | र्व | मा | सी | द्भी | म | त | रं | म | हत् |