पदच्छेदः
| तेषु | तद् (७.३) |
| काञ्चनचित्रेषु | काञ्चन–चित्र (७.३) |
| स्वास्तीर्णेषु | सु (अव्ययः)–आस्तीर्ण (√आ-स्तृ + क्त, ७.३) |
| सुखेषु | सुख (७.३) |
| च | च (अव्ययः) |
| यथार्हम् | यथार्ह (२.१) |
| उपविष्टास्ते | उपविष्ट (√उप-विश् + क्त, १.३)–तद् (१.३) |
| आसनेष्व् | आसन (७.३) |
| ऋषिपुंगवाः | ऋषि–पुंगव (१.३) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ते | षु | का | ञ्च | न | चि | त्रे | षु |
| स्वा | स्ती | र्णे | षु | सु | खे | षु | च |
| य | था | र्ह | मु | प | वि | ष्टा | स्ते |
| आ | स | ने | ष्वृ | षि | पुं | ग | वाः |