कुम्भकर्णस्तु दुष्टात्मा चिन्तयामास दुःखितः ।
कीदृशं किं न्विदं वाक्यं ममाद्य वदनाच्च्युतम् ॥
कुम्भकर्णस्तु दुष्टात्मा चिन्तयामास दुःखितः ।
कीदृशं किं न्विदं वाक्यं ममाद्य वदनाच्च्युतम् ॥
पदच्छेदः
| कुम्भकर्णस्तु | कुम्भकर्ण (१.१)–तु (अव्ययः) |
| दुष्टात्मा | दुष्ट (√दुष् + क्त)–आत्मन् (१.१) |
| चिन्तयामास | चिन्तयामास (√चिन्तय् प्र.पु. एक.) |
| दुःखितः | दुःखित (१.१) |
| कीदृशं | कीदृश (१.१) |
| किं | क (१.१) |
| न्विदं | नु (अव्ययः)–इदम् (१.१) |
| वाक्यं | वाक्य (१.१) |
| ममाद्य | मद् (६.१)–अद्य (अव्ययः) |
| वदनाच्च्युतम् | वदन (५.१)–च्युत (√च्यु + क्त, १.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| कु | म्भ | क | र्ण | स्तु | दु | ष्टा | त्मा |
| चि | न्त | या | मा | स | दुः | खि | तः |
| की | दृ | शं | किं | न्वि | दं | वा | क्यं |
| म | मा | द्य | व | द | ना | च्च्यु | तम् |