यस्मादेष परख्यासु स्त्रीषु रज्यति दुर्मतिः ।
तस्माद्धि स्त्रीकृतेनैव वधं प्राप्स्यति रावणः ॥
यस्मादेष परख्यासु स्त्रीषु रज्यति दुर्मतिः ।
तस्माद्धि स्त्रीकृतेनैव वधं प्राप्स्यति रावणः ॥
पदच्छेदः
| यस्माद् | यस्मात् (अव्ययः) |
| एष | एतद् (१.१) |
| परक्यासु | परक्य (७.३) |
| स्त्रीषु | स्त्री (७.३) |
| रज्यति | रज्यति (√रञ्ज् लट् प्र.पु. एक.) |
| दुर्मतिः | दुर्मति (१.१) |
| तस्माद्धि | तस्मात् (अव्ययः)–हि (अव्ययः) |
| स्त्रीकृतेनैव | स्त्री–कृत (३.१)–एव (अव्ययः) |
| वधं | वध (२.१) |
| प्राप्स्यति | प्राप्स्यति (√प्र-आप् लृट् प्र.पु. एक.) |
| रावणः | रावण (१.१) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| य | स्मा | दे | ष | प | र | ख्या | सु |
| स्त्री | षु | र | ज्य | ति | दु | र्म | तिः |
| त | स्मा | द्धि | स्त्री | कृ | ते | नै | व |
| व | धं | प्रा | प्स्य | ति | रा | व | णः |