स कीर्यमाणः कुसुमाक्षतोत्करै;र्द्विजैः सपौरैः पुरुहूतसंनिभः ।
तदार्जुनः संप्रविवेश तां पुरीं; बलिं निगृह्यैव सहस्रलोचनः ॥
स कीर्यमाणः कुसुमाक्षतोत्करै;र्द्विजैः सपौरैः पुरुहूतसंनिभः ।
तदार्जुनः संप्रविवेश तां पुरीं; बलिं निगृह्यैव सहस्रलोचनः ॥
M N Dutt
Having thus struck terror to the night-rangers, he, encircled by his own kinsmen, repaired to his own city with Ravana, carrying him bound like to Indra carrying Bali bound. Thereupon flowers and fried paddy were showered upon him by the Brāhmaṇas and citizens.पदच्छेदः
| स | तद् (१.१) |
| कीर्यमाणः | कीर्यमाण (√कृ + शानच्, १.१) |
| कुसुमाक्षतोत्करैर् | कुसुम–अक्षत–उत्कर (३.३) |
| द्विजैः | द्विज (३.३) |
| सपौरैः | स (अव्ययः)–पौर (३.३) |
| पुरुहूतसंनिभः | पुरुहूत–संनिभ (१.१) |
| तदार्जुनः | तदा (अव्ययः)–अर्जुन (१.१) |
| सम्प्रविवेश | सम्प्रविवेश (√सम्प्र-विश् लिट् प्र.पु. एक.) |
| तां | तद् (२.१) |
| पुरीं | पुरी (२.१) |
| बलिं | बलि (२.१) |
| निगृह्येव | निगृह्य (√नि-ग्रह् + ल्यप्)–इव (अव्ययः) |
| सहस्रलोचनः | सहस्रलोचन (१.१) |
छन्दः
वंशस्थम् [१२: जतजर]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ | ९ | १० | ११ | १२ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| स | की | र्य | मा | णः | कु | सु | मा | क्ष | तो | त्क | रै |
| र्द्वि | जैः | स | पौ | रैः | पु | रु | हू | त | सं | नि | भः |
| त | दा | र्जु | नः | सं | प्र | वि | वे | श | तां | पु | रीं |
| ब | लिं | नि | गृ | ह्यै | व | स | ह | स्र | लो | च | नः |
| ज | त | ज | र | ||||||||