M N Dutt
Hearing Rāghava's words, fair and fraught with polished phrase and period, Agastya, struck with surprise, said to Rāghava.
पदच्छेदः
| राघवस्य | राघव (६.१) |
| तु | तु (अव्ययः) |
| तच्छ्रुत्वा | तद् (२.१)–श्रुत्वा (√श्रु + क्त्वा) |
| संस्कारालंकृतं | संस्कार–अलंकृत (√अलम्-कृ + क्त, २.१) |
| वचः | वचस् (२.१) |
| ईषद्विस्मयमानस्तम् | ईषत् (अव्ययः)–विस्मयमान (√वि-स्मि + शानच्, १.१)–तद् (२.१) |
| अगस्त्यः | अगस्त्य (१.१) |
| प्राह | प्राह (√प्र-अह् लिट् प्र.पु. एक.) |
| राघवम् | राघव (२.१) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| रा | घ | व | स्य | तु | त | च्छ्रु | त्वा |
| सं | स्का | रा | लं | कृ | तं | व | चः |
| ई | ष | द्वि | स्म | य | मा | न | स्त |
| म | ग | स्त्यः | प्रा | ह | रा | घ | वम् |