M N Dutt
Do you therefore consult with me even today as to what is proper. Do you consider carefully and tell me what is auspicious and productive of well-being in the long run.
पदच्छेदः
| अस्मिन्न् | इदम् (७.१) |
| अहनि | अहर् (७.१) |
| यच्छ्रेयश्चिन्त्यतां | यद् (१.१)–श्रेयस् (१.१)–चिन्त्यताम् (√चिन्तय् प्र.पु. एक.) |
| तन्मया | तद् (१.१)–मद् (३.१) |
| सह | सह (अव्ययः) |
| हितं | हित (२.१) |
| चायतियुक्तं | च (अव्ययः)–आयति–युक्त (√युज् + क्त, २.१) |
| च | च (अव्ययः) |
| प्रयतौ | प्रयत (√प्र-यम् + क्त, १.२) |
| वक्तुम् | वक्तुम् (√वच् + तुमुन्) |
| अर्हथः | अर्हथः (√अर्ह् लट् म.पु. एक.) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| अ | स्मि | न्न | ह | नि | य | च्छ्रे | य |
| श्चि | न्त्य | तां | त | न्म | या | स | ह |
| हि | तं | चा | य | ति | यु | क्तं | च |
| प्र | य | तौ | व | क्तु | म | र्ह | थ |