पदच्छेदः
| तेषां | तद् (६.३) |
| संवदताम् | संवदत् (√सम्-वद् + शतृ, ६.३) |
| एवं | एवम् (अव्ययः) |
| श्रोतॄणां | श्रोतृ (६.३) |
| हर्षवर्धनम् | हर्ष–वर्धन (२.१) |
| गेयं | गेय (२.१) |
| प्रचक्रतुस्तत्र | प्रचक्रतुः (√प्र-कृ लिट् प्र.पु. द्वि.)–तत्र (अव्ययः) |
| तावुभौ | तद् (१.२)–उभ् (१.२) |
| मुनिदारकौ | मुनि–दारक (१.२) |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ते | षां | सं | व | द | ता | मे | वं |
| श्रो | तॄ | णां | ह | र्ष | व | र्ध | नम् |
| गे | यं | प्र | च | क्र | तु | स्त | त्र |
| ता | वु | भौ | मु | नि | दा | र | कौ |