M N Dutt
Having given up all actions of senses, and suffered the pains of going on foot he issued out of the city speechless like to the burning sun.
पदच्छेदः
| अव्याहरन् | अव्याहरत् (१.१) |
| क्वचित् | क्वचिद् (अव्ययः) |
| किंचिन्निश्चेष्टो | कश्चित् (२.१)–निश्चेष्ट (१.१) |
| निःसुखः | निःसुख (१.१) |
| पथि | पथिन् (७.१) |
| निर्जगाम | निर्जगाम (√निः-गम् लिट् प्र.पु. एक.) |
| गृहात् | गृह (५.१) |
| तस्माद् | तद् (५.१) |
| दीप्यमानो | दीप्यमान (√दीप् + शानच्, १.१) |
| यथांशुमान् | यथा (अव्ययः)–अंशुमन्त् (१.१) |
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|
| अ | व्या | ह | र | न्क्व | चि | त्किं | चि |
| न्नि | श्चे | ष्टो | निः | सु | खः | प | थि |
| नि | र्ज | गा | म | गृ | हा | त्त | स्मा |
| द्दी | प्य | मा | नो | य | थां | शु | मान् |