अन्वयः
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अत्रस्तः सः आत्मानं जुगोप अनातुरः धर्मं भेजे अगृध्नुः अर्थम् आददे असक्तः सुखम् अन्वभूत्।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
जुगोपेति॥ अत्रस्तोऽभीतः सन्।
त्रस्नौ भीरुभीरुकभीलुकाः इत्यमरः (अमरकोशः ३.१.२२ ) । त्रासोपाधिमन्तरेणैव त्रिवर्गसिद्धेः प्रथमसाधनत्वादेवाऽऽत्मानं शरीरं जुगोप रक्षितवान्। अनातुरोऽरुग्ण एव धर्मं सुकृतं भेजे। अर्जितवानित्यर्थः। अगृध्नुरगर्धनशील एवार्थमाददे स्वीकृतवान्। गृध्नुस्तु गर्धनः । लुब्धोऽभिलाषुकस्तृष्णक्समौलोलुपलोल्लभौ। इत्यमरः (अमरकोशः ३.१.२२ ) । त्रसिगृधिधृषिक्षिपेः क्नुः (अष्टाध्यायी ३.२.१४० ) इति क्नुप्रत्ययः। असक्त आसक्तिरहित एव सुखमन्वभूत् ॥
Summary
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Without fear he protected himself, without ailment he practiced dharma, without greed he acquired wealth, and without attachment he enjoyed pleasures.
सारांश
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राजा दिलीप निर्भय होकर अपनी रक्षा करते, बिना व्याकुलता के धर्म का पालन करते, लोभ रहित होकर धन संग्रह करते और बिना आसक्ति के सुख भोगते थे।
पदच्छेदः
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| सः | तद् (१.१) | he (King Dilīpa) |
| अत्रस्तः | अ–त्रस्त (√त्रस्+क्त, १.१) | without fear |
| आत्मानम् | आत्मन् (२.१) | himself |
| जुगोप | जुगोप (√गुप् कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | protected |
| अनातुरः | अ–आतुर (१.१) | without disease |
| धर्मम् | धर्म (२.१) | righteousness |
| भेजे | भेजे (√भज् कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | followed |
| अगृध्नुः | अ–गृध्नु (१.१) | without greed |
| अर्थम् | अर्थ (२.१) | wealth |
| आददे | आददे (आ√दा कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | accepted/collected |
| असक्तः | अ–सक्त (√सञ्ज्+क्त, १.१) | without attachment |
| सुखम् | सुख (२.१) | pleasure |
| अन्वभूत् | अन्वभूत् (अनु√भू कर्तरि लुङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | experienced |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| जु | गो | पा | त्मा | न | म | त्र | स्तो |
| भे | जे | ध | र्म | म | ना | तु | रः |
| अ | गृ | ध्नु | रा | द | दे | सो | ऽर्थ |
| म | स | क्तः | सु | ख | म | न्व | भूत् |
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