अन्वयः
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मन्दः कवियशःप्रार्थी प्रांशुलभ्ये फले लोभात् उद्बाहुः वामनः इव उपहास्यतां गमिष्यामि ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
मन्द इति॥ किं च मन्दो मूढः।
मूढाल्पापटुनिर्भाग्या मन्दाः स्युः इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.१०२ ) । तथापि कवियशःप्रार्थी। कवीनां यशः काव्यनिर्माणेन जातं तत्प्रार्थनाशीलोऽहं प्रांशुनोन्नतपुरुषेण लभ्ये प्राप्ये फले फलविषये लोभादुद्बाहुः फलग्रहणायोच्छ्रितहस्तो वामनः ह्रस्व इव। खर्वो ह्रस्वश्च वामनः इत्यमरः (अमरकोशः २.६.४६ ) । उपहास्यता-मुपहासविषयताम्। ऋहलोर्ण्यत् (अष्टाध्यायी ३.१.१२४ ) इति ण्यत्प्रत्ययः। गमिष्यामि प्राप्स्यामि ॥
Summary
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Though dull-witted, I seek the fame of a poet and shall surely become an object of ridicule, like a dwarf stretching his arms in greed for a fruit reachable only by a tall man.
सारांश
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मंदबुद्धि होते हुए भी कवियों जैसा यश चाहने वाला मैं उपहास का पात्र बनूँगा, जैसे ऊँचे फल के लोभ में हाथ फैलाया हुआ कोई बौना।
पदच्छेदः
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| मन्दः | मन्द (१.१) | dull-witted |
| कवियशःप्रार्थी | कवि–यशस्–प्रार्थी (प्र√अर्थ्+णिन्, १.१) | seeking the fame of a poet |
| गमिष्यामि | गमिष्यामि (√गम् कर्तरि लृट् (परस्मै.) उ.पु. एक.) | I will attain |
| उपहास्यताम् | उपहास्यता (उप√हस्+ण्यत्+तल्, २.१) | ridicule |
| प्रांशुलभ्ये | प्रांशु–लभ्य (√लभ्+यत्, ७.१) | attainable by a tall man |
| फले | फल (७.१) | for the fruit |
| लोभात् | लोभ (५.१) | out of greed |
| उद्बाहुः | उद्–बाहु (१.१) | with uplifted arms |
| इव | इव | like |
| वामनः | वामन (१.१) | a dwarf |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | न्दः | क | वि | य | शः | प्रा | र्थी |
| ग | मि | ष्या | म्यु | प | हा | स्य | ताम् |
| प्रां | शु | ल | भ्ये | फ | ले | लो | भा |
| दु | द्बा | हु | रि | व | वा | म | नः |
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