अन्वयः
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तौ सुखस्पर्शैः शालनिर्यासगन्धिभिः पुष्परेणूत्किरैः आधूतवनराजिभिः वातैः सेव्यमानौ जग्मतुः।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
सेव्यमानाविति॥ पुनः कथंभूतौ? सुखः शीतलत्वात्प्रियः स्पर्शो येषां तैः। शालनिर्यासगन्धिभिः सर्जतरुनिस्यन्दगन्धवद्भिः।
शालः सर्जतरुः स्मृतः इति शाश्वतः। उत्किरन्ति विक्षिपन्तीत्युत्किराः। इगुपध- (अष्टाध्यायी ३.१.१३५ ) इत्यादिना किरतेः कप्रत्ययः। पुष्परेणूनामुत्किरास्तैराधूता मान्द्यादीषत्कम्पिता वनराजयो यैस्तैर्वातैः सेव्यमानौ ॥
Summary
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They were served by breezes that were pleasant to the touch, fragrant with the resin of Śāla trees, scattering flower pollen, and gently shaking the rows of forest trees.
सारांश
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शाल के वृक्षों की सुगंध से युक्त, सुखद स्पर्श वाली और फूलों के पराग को बिखेरती वन की वायु मार्ग में उनका स्वागत कर रही थी।
पदच्छेदः
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| सेव्यमानौ | सेव्यमान (√सेव्+शानच्, १.२) | being served |
| सुखस्पर्शैः | सुख–स्पर्श (३.३) | pleasant to the touch |
| शालनिर्यासगन्धिभिः | शाल–निर्यास–गन्धिन् (३.३) | fragrant with the resin of Shala trees |
| पुष्परेणूत्किरैः | पुष्प–रेणु–उत्किर (उत्√कॄ+क, ३.३) | scattering flower pollen |
| वातैः | वात (३.३) | by breezes |
| आधूतवनराजिभिः | आधूत (आ√धू+क्त)–वन–राजि (३.३) | shaking the rows of forest trees |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| से | व्य | मा | नौ | सु | ख | स्प | र्शैः |
| शा | ल | नि | र्या | स | ग | न्धि | भिः |
| पु | ष्प | रे | णू | त्कि | रै | र्वा | तै |
| रा | धू | त | व | न | रा | जि | भिः |
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