अन्वयः
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रथनेमिस्वन उन्मुखैः शिखण्डिभिः द्विधा भिन्नाः षड्जसंवादिनीः मनोभिरामाः केकाः श्रृण्वन्तौ तौ जग्मतुः।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
मनोभिरामा इति॥ रथनेमिस्वनोन्मुखैः। मेघध्वनिशङ्कयोन्नमितमुखैरित्यर्थः। शिखण्डिभिर्मयूरैर्द्विधा भिन्नाः। शुद्धविकृतभेदेनाविष्कृतावस्थायांच्युताच्युतभेदेन वा षड्जो द्विविधः। तत्सादृश्यात्केका अपि द्विधा भिन्ना इत्युच्यते। अत एवाह-षड्जसंवादिनीरिति। षड्भ्यः स्थानेभ्यो जातः षड्जः। तदुक्तम्-
नासाकण्ठमुरस्तालुजिह्वादन्तांश्च संस्पृशन् । षड्भ्यः संजायते यस्मात्तस्मात्षङ्ज्र इति स्मृतः ॥ स च तन्त्रीकण्ठजन्मा स्वरविशेषः। निषादर्पभागान्धारषड्जमध्यमधैवताः। पञ्चमश्चेत्यमी सप्त तन्त्रीकण्ठोत्थिताः स्वराः॥ इत्यमरः (अमरकोशः २.५.३३ ) । षड्जेनसंवादिनीः सदृशीः। तदुक्तं मातङ्गेन-षड्जं मयूरो वदति इति। मनोभिरामा मनसः प्रियाः। के मूर्ध्नि कायन्ति ध्वनन्तीति केका मयूरवाण्यः। केका वाणी मयूरस्य इत्यमरः (अमरकोशः २.५.३३ ) । ताः केकाः शृण्वन्तौ। इति श्लोकार्थः॥
Summary
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They traveled listening to the delightful cries of peacocks, who turned their necks up at the sound of the chariot wheels; these cries were divided into two notes and harmonized with the ṣaḍja musical scale.
सारांश
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रथ के पहियों की ध्वनि सुनने को उत्सुक मोरों द्वारा की गई षड्ज स्वर वाली सुंदर 'केका' ध्वनियों को सुनते हुए वे दोनों आगे बढ़े।
पदच्छेदः
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| मनोभिरामाः | मनस्–अभिराम (अभि√रम्+घञ्, २.३) | delightful to the mind |
| शृण्वन्तौ | शृण्वत् (√श्रु+शतृ, १.२) | listening |
| रथनेमिस्वनोन्मुखैः | रथ–नेमि–स्वन–उन्मुख (उत्√मुख, ३.३) | looking up at the sound of the chariot's rim |
| षड्जसंवादिनीः | षड्ज–संवादिन् (सम्√वद्+णिन्, २.३) | harmonizing with the Sadja note |
| केकाः | केका (२.३) | peacock cries |
| द्विधा | द्विधा | in two ways |
| भिन्नाः | भिन्न (√भिद्+क्त, २.३) | split |
| शिखण्डिभिः | शिखण्डिन् (३.३) | by peacocks |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| म | नो | भि | रा | माः | श्रृ | ण्व | न्तौ |
| र | थ | ने | मि | स्व | नो | न्मु | खैः |
| ष | ड्ज | सं | वा | दि | नीः | के | का |
| द्वि | धा | भि | न्नाः | शि | ख | ण्डि | भिः |
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