अन्वयः
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अदूर उज्झित वर्त्मसु स्यन्दन आबद्ध दृष्टिषु मृगद्वन्द्वेषु परस्पर अक्षि सादृश्यम् पश्यन्तौ तौ जग्मतुः।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
परस्परेति॥ विश्रम्भाददूरं समीपं यथा भवति तथोज्झितं वर्त्म यैस्तेषु । स्यन्दनाबद्धदृष्टिषु स्यन्दने रथ आबद्धाऽऽसञ्जिता दृष्टिर्नेत्रं यैस्तेषु।
दृग्दृष्टिनेत्रलोचनचक्षुर्नयनाम्बकेक्षणाक्षीणि इति हलायुधः। कौतुकवशाद्रथासक्तदृष्टिष्वित्यर्थः। मृग्यश्च मृगाश्च मृगाः। पुमान्स्त्रिया (अष्टाध्यायी १.२.६७ ) इत्येकशेषः। ते।ां द्वन्द्वेषु मिथुनेषु। स्त्रीपुंसौ मिथुनं द्वन्द्वम् इत्यमरः (अमरकोशः २.५.४१ ) । परस्पराक्ष्णां सादृश्यं पश्यन्तौ। द्वन्द्वशब्दसामर्थ्यान्मृगीषु सुदक्षिणाक्षिसादृश्यं दिलीपो दिलीपाक्षिसादृश्यं च मृगेषु सुदक्षिणेत्येवं विवेक्तव्यम् ॥
Summary
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They observed the resemblance between each other's eyes in the pairs of deer that stood near the path, keeping their gaze fixed on the chariot.
सारांश
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रथ को टकटकी लगाकर देखते हुए मार्ग के निकट खड़े मृगों के जोड़ों में वे एक-दूसरे की आँखों की समानता का आनंद ले रहे थे।
पदच्छेदः
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| परस्पराक्षिसादृश्यम् | परस्पर–अक्षि–सादृश्य (२.१) | resemblance of each other's eyes |
| अदूरोज्झितवर्त्मसु | अ–दूर–उज्झित (+क्त)–वर्त्मन् (७.३) | who had not left the path far away |
| मृगद्वन्द्वेषु | मृग–द्वन्द्व (७.३) | in pairs of deer |
| पश्यन्तौ | पश्यत् (√दृश्+शतृ, १.२) | observing |
| स्यन्दनाबद्धदृष्टिषु | स्यन्दन–आबद्ध (आ√बन्ध+क्त)–दृष्टि (७.३) | fixing their gaze on the chariot |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| प | र | स्प | रा | क्षि | सा | दृ | श्य |
| म | दू | रो | ज्झि | त | व | र्त्म | सु |
| मृ | ग | द्व | न्द्वे | षु | प | श्य | न्तौ |
| स्य | न्द | ना | ब | द्ध | दृ | ष्टि | षु |
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