अन्वयः
AI
कल-निर्ह्रादैः श्रेणी-बन्धात् अ-स्तम्भाम् तोरण-स्रजम् वितन्वद्भिः सारसैः (सह) क्वचित् उन्नमित-आननौ ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
श्रेणीति॥ श्रेणीबन्धात् पङ्क्तिबन्धनाद्धेतोः अस्तम्भामाधारस्तम्भरहिताम्। तोरणं बहिर्द्वारम्।
तोरणोऽस्त्री बहिर्द्वारम् इत्यमरः (अमरकोशः २.२.१७ ) । तत्र या स्रग्विरच्यते तां तोरणस्रजं वितन्वद्भिः। कुर्वद्भिरिवेत्यर्थः। उत्प्रेक्षाव्यञ्जकेवशब्दप्रयोगाभावेऽपि गम्योत्प्रेक्षेयम्। कलनिर्ह्लादैरव्यक्तमधुरध्वनिभिः सारसैः पक्षिविशेषैः करणैः क्वचिदुन्नमिताननौ। सारसो मैथुनी कामी गोनर्दः पुष्कराह्वयः इति यादवः ॥
Summary
AI
King Dilīpa and Queen Sudakṣiṇā traveled with their faces raised, observing rows of cranes. These birds, making sweet sounds and flying in formation, appeared like a garland hung across the sky without any supporting pillars.
सारांश
AI
आकाश में पंक्तिबद्ध होकर उड़ते हुए मधुर शब्द करने वाले सारस पक्षी बिना खंभों की तोरणमाला के समान लग रहे थे, जिन्हें देखने के लिए उन दोनों ने अपने मुख ऊपर उठा रखे थे।
पदच्छेदः
AI
| श्रेणीबन्धात् | श्रेणी–बन्ध (५.१) | due to their formation in a row |
| वितन्वद्भिः | वितन्वत् (वि√तन्+शतृ, ३.३) | forming or spreading |
| अस्तम्भाम् | अस्तम्भ (२.१) | pillar-less |
| तोरणस्रजम् | तोरण–स्रज् (२.१) | an arch-garland |
| सारसैः | सारस (३.३) | by the cranes |
| कलनिर्ह्रादैः | कल–निर्ह्राद (३.३) | having sweet warbling sounds |
| क्वचित् | क्वचित् | somewhere |
| उन्नमिताननौ | उन्नमित (उत्√नम्+णिच्+क्त)–आनन (१.२) | their faces raised upwards |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| श्रे | णी | ब | न्धा | द्वि | त | न्व | द्भि |
| र | स्त | म्भां | तो | र | ण | स्र | जम् |
| सा | र | सैः | क | ल | नि | र्ह्रा | दैः |
| क्व | चि | दु | न्न | मि | ता | न | नौ |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.