पवनस्यानुकूलत्वात्प्रार्थनासिद्धिशंसिनः ।
रजोभिस्तुरगोत्कीर्णैरस्पृष्टालकवेष्टनौ ॥

अन्वयः AI प्रार्थना-सिद्धि-शंसिनः पवनस्य अनुकूलत्वात् तुरग-उत्कीर्णैः रजोभिः अ-स्पृष्ट-आलक-वेष्टनौ ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः) पवनस्येति॥ प्रार्थनासिद्धिशंसिनोऽनुकूलत्वादेव मनोरथसिद्धिसूचकस्य पवनस्यानुकूलत्वाद्गन्तव्यदिगभिमुखत्वात्। तुरगोत्कीर्णै रजोभिरस्पृष्टा अलका देव्या वेष्टनमुष्णीषं च राज्ञो ययोस्तौ तथोक्तौ। शिरसा वेष्टनशोभिना सुतः (८। १२)इति वक्ष्यति॥
Summary AI As the wind blew favorably, signaling the fulfillment of their desires, the dust kicked up by the horses' hooves did not touch or soil the couple's beautiful hair or the ornaments around their locks.
सारांश AI अनुकूल वायु बहने के कारण, घोड़ों के खुरों से उड़ी हुई धूल उनके केशपाश को स्पर्श नहीं कर पा रही थी, जो उनकी कार्य-सिद्धि का शुभ संकेत दे रही थी।
पदच्छेदः AI
पवनस्यपवन (६.१) of the wind
अनुकूलत्वात्अनुकूल (५.१) due to the favorability
प्रार्थनासिद्धिशंसिनःप्रार्थनासिद्धिशंसिन् (६.१) which betokened the success of their prayer
रजोभिःरजस् (३.३) by the dust particles
तुरगोत्कीर्णैःतुरगउत्कीर्ण (उत्√कृ+क्त, ३.३) thrown up by the horses
अस्पृष्टालकवेष्टनौअस्पृष्टअलकवेष्टन (१.२) whose hair-locks remained untouched
छन्दः अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
स्या नु कू त्वा
त्प्रा र्थ ना सि द्धि शं सि नः
जो भि स्तु गो त्की र्णै
स्पृ ष्टा वे ष्ट नौ
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