अन्वयः
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शुद्ध-वेषयोः व्रजतोः तयोः का अपि अभिख्या हिम-निर्मुक्तयोः चित्रा-चन्द्रमसोः योगे इव आसीत् ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
कापीति। व्रजतोर्गच्छतोः शुद्धवेषयोरुज्ज्वलनेपथ्ययोः तयोः सुदक्षिणादिलीपयोः। हिमनिर्मुक्तयोश्चित्राचन्द्रमसोरिव। योगे सति काप्यनिर्वाच्याऽभिख्या शोभाऽ।ञसीत्।
अभिख्या नामशोभयोः इत्यमरः (अमरकोशः ३.३.१६४ ) । आतश्चोपसर्गे (अष्टाध्यायी ३.३.१०६ ) इत्यङ्प्रत्ययः। चित्रा नक्षत्रविशेषः। शिशिरापगमे चैत्र्यां चित्रापूर्णचन्द्रमसोरिवेत्यर्थः ॥
Summary
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Dressed in pure attire, the splendor of the traveling couple was incomparable. They looked as radiant as the conjunction of the moon and the star Citrā when they are finally freed from the winter clouds.
सारांश
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शुद्ध वेश धारण किए हुए वे दोनों चलते हुए ऐसे शोभा पा रहे थे जैसे कुहरे से मुक्त होने पर चित्रा नक्षत्र और चंद्रमा का मिलन सुशोभित होता है।
पदच्छेदः
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| का अपि | किम् (१.१)–अपि | some indescribable |
| अभिख्या | अभिख्या (१.१) | splendor / beauty |
| तयोः | तद् (६.२) | of the two of them |
| आसीत् | आसीत् (√अस् कर्तरि लङ् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | there was |
| व्रजतोः | व्रजत् (√व्रज्+शतृ, ६.२) | while traveling |
| शुद्धवेषयोः | शुद्ध–वेष (६.२) | wearing pure/white garments |
| हिमनिर्मुक्तयोः | हिम–निर्मुक्त (निर्√मुच्+क्त, ६.२) | freed from frost/clouds |
| योगे | योग (७.१) | in the union |
| चित्राचन्द्रमसोरिव | चित्रा–चन्द्रमस् (६.२)–इव | like the Chitra star and the Moon |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| का | प्य | भि | ख्या | त | यो | रा | सी |
| द्व्र | ज | तोः | शु | द्ध | वे | ष | योः |
| हि | म | नि | र्मु | क्त | यो | र्यो | गे |
| चि | त्रा | च | न्द्र | म | सो | रि | व |
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