अन्वयः
AI
वनान्तरात् उपावृत्तैः समित्-कुश-फल-आहरैः अदृश्य-अग्नि-प्रत्युद्यातैः तपस्विभिः पूर्यमाणम् ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
वनान्तरादिति॥ वनान्तरादन्यस्माद्वनात् उपावृत्तैः प्रत्यागतैः। समिधश्च कुशांश्च फलानि चाहर्तुं शीलं येषामिति समित्कुशफलाहराः, तैः।
आङिताच्छील्ये (अष्टाध्यायी ३.२.११ ) इति हरतेराङ्पूर्वादच्प्रत्ययः। अदृश्यैर्दर्शनायोग्यैरग्निभिर्वैतानिकैः प्रत्युद्याताः प्रत्युद्गताः। तैस्तपस्विभिः पूर्यमाणम्। प्रोष्यागच्छतामाहिताग्नीनामग्नयः प्रत्युद्यान्ति इति श्रुतेः। यथाह-कामं पितरं प्रोषितवन्तं पुत्राः प्रत्याधावन्ति, एव ह वा एवमेतग्नयः प्रत्याधावन्ति सशकलान्दारूनिवाहरन् इति॥
Summary
AI
The hermitage was filling with ascetics returning from the forest with sacrificial wood, kuśa grass, and fruits. They were welcomed by the invisible sacred fires, which seemed to come forward to meet them.
सारांश
AI
वह आश्रम वन से समिधा, कुश और फल लेकर लौटते हुए उन तपस्वियों से भरा था जिनका स्वागत उनके द्वारा प्रज्वलित अदृश्य अग्नि की ऊष्मा कर रही थी।
पदच्छेदः
AI
| वनान्तरात् | वन–अन्तर (५.१) | from the interior of the forest |
| उपावृत्तैः | उपावृत्त (उप+आ√वृत्+क्त, ३.३) | by those who had returned |
| समित्कुशफलाहरैः | समिध्–कुश–फल–आहर (३.३) | bringing fuel, kusha grass, and fruits |
| पूर्यमाणम् | पूर्यमाण (√पृ+शानच्+यक्, २.१) | being filled |
| अदृश्याग्निप्रत्युद्यातैः | अदृश्य–अग्नि–प्रत्युद्यात (३.३) | welcomed by the invisible fires |
| तपस्विभिः | तपस्विन् (३.३) | by the ascetics |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| व | ना | न्त | रा | दु | पा | वृ | त्तैः |
| स | मि | त्कु | श | फ | ला | ह | रैः |
| पू | र्य | मा | ण | म | दृ | श्या | ग्रि |
| प्र | त्यु | द्या | तै | स्त | प | स्वि | भिः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.