अन्वयः
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सः अहम् आजन्मशुद्धानाम् आफलोदयकर्मणाम् आसमुद्रक्षितीशानाम् आनाकरथवर्त्मनाम् रघूणाम् अन्वयम् वक्ष्ये ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
सोऽहमिति॥ सोऽहम्।
रघूणामन्वयं वक्ष्ये (१।९) इत्युत्तरेण संबन्धः। किंविधानां रघूणामित्यत्रोत्तराणि विशेषणानि योज्यानि। आ जन्मनः। जन्माभ्येत्यर्थथः। आङ् मर्यादाभिविध्योः (अष्टाध्यायी २.१.१३ ) इत्यव्ययीभावः, तस्य शुद्धानामित्यनेन सुप्सुपेति समासः। एवमुत्तरत्रापि द्रष्टव्यम्। आजन्मशुद्धानाम्। निषेकादिसर्वसंस्कारसंपन्नानामित्यर्थथः। आफलोदयम्। आफलसिद्धेः कर्म येषां ते तथोक्तास्तेषाम्। प्रारब्धान्तगामिनामित्यर्थः। आसमुद्रं क्षितेरीशानाम्। सार्वभौमाणामित्यर्थः। आनाकं रथवर्त्म येषां तेषाम्। इन्द्रसहचारिणामित्यर्थः। अत्र सर्वत्राऽऽङोऽभिविध्यर्थत्वं द्रष्टव्यम्। अन्यथा मर्यादार्थत्वे जन्मादिषु शुध्द्यभावप्रसङ्गात् ॥
Summary
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I shall describe the lineage of the Raghu dynasty—those who were pure from birth, who worked until success was achieved, who ruled the earth to the oceans, and whose chariots traveled to heaven.
सारांश
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मैं जन्म से ही शुद्ध, फल प्राप्ति तक कर्म करने वाले, समुद्र तक पृथ्वी के स्वामी और स्वर्ग तक रथ ले जाने वाले रघुवंशियों का वर्णन करूँगा।
पदच्छेदः
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| सः | तद् (१.१) | that |
| अहम् | अस्मद् (१.१) | I |
| आजन्मशुद्धानाम् | आ–जन्मन्–शुद्ध (६.३) | of those pure from birth |
| आफलोदयकर्मणाम् | आ–फल–उदय–कर्मन् (६.३) | whose actions lasted until success |
| आसमुद्रक्षितीशानाम् | आ–समुद्र–क्षिति–ईश (६.३) | who ruled the earth to the ocean |
| आनाकरथवर्त्मनाम् | आ–नाक–रथ–वर्त्मन् (६.३) | whose chariots reached heaven |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| सो | ऽह | मा | ज | न्म | शु | द्धा | ना |
| मा | फ | लो | द | य | क | र्म | णाम् |
| आ | स | मु | द्र | क्षि | ती | शा | ना |
| मा | ना | क | र | थ | व | र्त्म | नाम् |
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