अन्वयः
AI
आतप-अत्यय-संक्षिप्त-नीवारासु उटज-अङ्गन-भूमिषु निषादिभिः मृगैः वर्तित-रोमन्थम् ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
आतपात्ययेति॥ आतपस्यात्ययेऽपगमे सति संक्षिप्ता राशीकृता नीवारास्तृणधान्यानि यासु तासु।
नीवारास्तृणधान्यानि इत्यमरः। उटजानां पर्णशालानामङ्गनभूमिषु चत्वरस्थानेषु। पर्णशालोटजोऽस्त्रियाम् इति। अङ्गनं चत्वराजिरे इति चामरः। निषादिभिरुपविष्टैर्मृगैर्वर्तितो निष्पादितो रोमन्थश्चर्वितचर्वणं यस्मिन्नाश्रमे तम् ॥
Summary
AI
In the courtyards of the huts, where the wild grains had been gathered after sunset, the deer sat peacefully, contentedly chewing their cud in the quiet atmosphere of the evening.
सारांश
AI
धूप समाप्त होने पर कुटियों के आँगन में जहाँ नीवार के दाने फैले हुए थे, वहाँ बैठे हुए हिरण निर्भयतापूर्वक जुगाली कर रहे थे।
पदच्छेदः
AI
| आतपात्ययसंक्षिप्तनीवारासु | आतप–अत्यय–संक्षिप्त (सम्√क्षिप्+क्त)–नीवार (७.३) | where wild grains were gathered after the sun's heat passed |
| निषादिभिः | निषादिन् (नि√सद्+णिन्, ३.३) | by those sitting down |
| मृगैः | मृग (३.३) | by the deer |
| वर्तितरोमन्थम् | वर्तित (√वृत्+णिच्+क्त)–रोमन्थ (२.१) | where the chewing of the cud was performed |
| उटजाङ्गनभूमिषु | उटज–अङ्गन–भूमि (७.३) | in the courtyard grounds of the leaf-huts |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| आ | त | पा | त्य | य | सं | क्षि | प्त |
| नी | वा | रा | सु | नि | षा | दि | भिः |
| मृ | गै | र्व | र्ति | त | रो | म | न्थ |
| मु | ट | जा | ङ्ग | न | भू | मि | षु |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.