अन्वयः
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सभ्याः गुप्त-तम-इन्द्रियाः मुनयो नय-चक्षुषे अर्हते स-भार्याय तस्मै गोप्त्रे अर्हणाम् चक्रुः ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
तस्मा इति॥ सभायां साधवः सभ्याः।
सभाया यः (अष्टाध्यायी ४.४.१०४ ) इति यप्रत्ययः। गुप्ततमेन्द्रियाः अत्यन्तनियमितेन्द्रियाः। मुनयः सभार्याय गोप्त्रे रक्षकाय। नयः शास्त्रमेव चक्षुस्तत्त्वावेदकं प्रमाणं यस्य तस्मै नयचक्षुषे। अत एवार्हते प्रशस्ताय। पूज्यायेत्यर्थः। अर्हः प्रशंसायाम् (अष्टाध्यायी ३.२.१३३ ) इति शतृप्रत्ययः। तस्मै राज्ञेऽर्हणां पूजां चक्रुः। पूजा नमस्यापचितिः सपर्यार्चार्हणाः समाः इत्यमरः (अमरकोशः २.७.३७ ) ॥
Summary
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The refined and self-controlled sages offered a respectful welcome and worship to the deserving king and his wife. They recognized Dilīpa as the righteous protector of the world, guided by the eyes of justice.
सारांश
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जितेंद्रिय और नीतिवान ऋषियों ने प्रजापालक राजा दिलीप और उनकी पत्नी का शास्त्रोक्त विधि से पूजन और आतिथ्य सत्कार किया।
पदच्छेदः
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| तस्मै | तद् (४.१) | to him |
| सभ्याः | सभ्य (१.३) | the polite/refined ones |
| सभार्याय | स–भार्या (४.१) | with his wife |
| गोप्त्रे | गोप्तृ (४.१) | to the protector |
| गुप्ततमेन्द्रियाः | गुप्त (√गुप्+क्त)–तम–इन्द्रिय (१.३) | those whose senses were highly controlled |
| अर्हणाम् | अर्हणा (२.१) | worship/hospitality |
| अर्हते | अर्हत् (√अर्ह्+शतृ, ४.१) | to the deserving one |
| चक्रुः | चक्रुः (√कृ कर्तरि लिट् (परस्मै.) प्र.पु. बहु.) | they performed |
| मुनयः | मुनि (१.३) | the sages |
| नयचक्षुषे | नय–चक्षुस् (४.१) | to him whose eyes are statesmanship |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| त | स्मै | स | भ्याः | स | भा | र्या | य |
| गो | प्त्रे | गु | प्त | त | मे | न्द्रि | याः |
| अ | र्ह | णा | म | र्ह | ते | च | क्रु |
| र्मु | न | यो | न | य | च | क्षु | षे |
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