अन्वयः
AI
अथ अर्थ-पतिः वदताम् वरः विजित-अरि-पुरः तस्य अथर्व-निधेः पुरः अर्थ्याम् वाचम् आददे ।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
अथेति॥ अथ प्रश्नानन्तरं विजितारिपुरो विजितशत्रुनगरो वदतां वक्तॄणां वरः श्रेष्ठः।
यतश्चनिर्धारणम् (अष्टाध्यायी २.३.४१ ) इति षष्टी। अर्थपती राजाथर्वणोऽथर्ववेदस्य निधेस्तस्य मुनेः पुरोऽग्रेऽर्थ्यामर्थामर्थादनपेताम्। धर्मपथ्यर्थन्यायादनपेते (अष्टाध्यायी ४.४.९२ ) इति यप्रत्ययः। वाचमादहे वक्तुमुपक्रान्तवानित्यर्थथः। अथर्वनिधेः इत्यनेन पुरोहितकृत्याभिज्ञत्वात्तत्कर्मनिर्वाहकत्वं मुनेरस्तीति सूच्यते। यथाह कामन्दकः-त्रय्यां च दण्डनीत्यां च कुशलः स्यात्पुरोहितः । अथर्वविहितं कुर्यान्नित्यं शान्तिकपौष्टिकम् ॥ इति ॥
Summary
AI
Then, the king, an eloquent orator and conqueror of enemy cities, began to speak meaningful and purposeful words in the presence of the sage, who was a master of the Atharvaveda.
सारांश
AI
शत्रुओं को जीतने वाले और बोलने वालों में श्रेष्ठ राजा दिलीप ने अथर्ववेद के ज्ञाता महर्षि वसिष्ठ के सम्मुख सारगर्भित वाणी में निवेदन किया।
पदच्छेदः
AI
| अथ | अथ | then |
| अथर्वनिधेः | अथर्वन्–निधि (६.१) | of the repository of Atharva-veda |
| तस्य | तद् (६.१) | of him |
| विजितारिपुरः | विजित (वि√जि+क्त)–अरि–पुर (१.१) | who had conquered the cities of enemies |
| पुरः | पुरस् | in front of |
| अर्थ्याम् | अर्थ्य (२.१) | meaningful |
| अर्थपतिः | अर्थ–पति (१.१) | the lord of wealth (the King) |
| वाचम् | वाच् (२.१) | speech |
| आददे | आददे (आ√दा कर्तरि लिट् (आत्मने.) प्र.पु. एक.) | took/commenced |
| वदताम् | वदत् (√वद्+शतृ, ६.३) | of those who speak |
| वरः | वर (१.१) | the best |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| अ | था | थ | र्व | नि | धे | स्त | स्य |
| वि | जि | ता | रि | पु | रः | पु | रः |
| अ | र्थ्या | म | र्थ | प | ति | र्वा | च |
| मा | द | दे | व | द | तां | व | रः |
Other texts to read
About
Sanskrit Sahitya is a free, open-access digital library of classical Sanskrit literature with AI-powered tools and translations.