अन्वयः
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हे होतः! त्वया विधिवत् अग्निषु आवर्जितं हविः अवग्रह-विशोषिणाम् सस्यानाम् वृष्टिः भवति।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
हविरिति॥ हे होतः। त्वया विधिवदग्निष्वावर्जितं प्रक्षिप्तं हविराज्यादिकं कर्तृ अवग्रहो वर्षप्रतिबन्धः।
अवे ग्रहो वर्षप्रतिबन्धे (अष्टाध्यायी ३.३.५१ ) इत्यञ्प्रत्ययः। वृष्टिर्वर्षं तद्विघातेऽवग्राहावग्रहौ समौ इत्यमरः (अमरकोशः १.३.१३ ) । तेन विशोषिणां विशुष्यतां सस्यानां वृष्टिर्भवति । वृष्टिरूपेण सस्यान्युपजीवयतीति भावः। अत्र मनुः(३।७६)-अग्मौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः ॥ इति ॥
Summary
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O sacrificer, the oblations offered by you into the fires according to rituals turn into rain for the crops parched by drought.
सारांश
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हे होता! आपके द्वारा शास्त्रों के अनुसार अग्नि में दी गई आहुतियां ही अकाल से सूखती हुई फसलों के लिए वर्षा का कारण बनती हैं।
पदच्छेदः
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| हविः | हविस् (१.१) | oblation |
| आवर्जितम् | आवर्जित (आ√वृज्+णिच्+क्त, १.१) | poured |
| होतः | होतृ (८.१) | O priest |
| त्वया | युष्मद् (३.१) | by you |
| विधिवत् | विधि (+वति) | according to rituals |
| अग्निषु | अग्नि (७.३) | into the fires |
| वृष्टिः | वृष्टि (१.१) | rain |
| भवति | भवति (√भू कर्तरि लट् (परस्मै.) प्र.पु. एक.) | becomes |
| सस्यानामम् | सस्य (६.३) | of the crops |
| अवग्रहविशोषिणाम् | अवग्रह–विशोषिन् (वि√शुष्+णिच्+णिनि, ६.३) | withered by drought |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ह | वि | रा | व | र्जि | तं | हो | त |
| स्त्व | या | वि | धि | व | द | ग्नि | षु |
| वृ | ष्टि | र्भ | व | ति | स | स्या | ना |
| म | व | ग्र | ह | वि | शो | षि | णाम् |
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