अन्वयः
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मदीयाः प्रजाः पुरुष-आयुष-जीविन्यः निरातङ्काः निरीतयः (सन्ति), यत् तस्य हेतुः त्वद्-ब्रह्म-वर्चसम् (अस्ति)।
सञ्जीविनीटीका (मल्लिनाथः)
पुरुषेति॥ आयुर्जीवितकालः। पुरुषस्यायुः पुरुपषायुषम्। वर्षशतमित्यर्थः।
शतायुर्वै पुरुषः इति श्रुतेः। अचतुर- (अष्टाध्यायी ५.४.७७ ) आदिसूत्रेणाच्प्रत्ययान्तो निपातः। मदीयाः प्रजाः। पुरुषायुषं जीवन्तीति पुरुषायुषजीविन्यः। निरातङ्का निर्भयाः, आतङ्को भयमाशङ्का इति हलायुधः। निरीतयोऽतिवृष्ट्यादिरहिता इति यत्तस्य सर्वस्य त्वद्ब्रह्मवर्चसं तव व्रताध्ययनसंपत्तिरेव हेतुः। व्रताध्ययनसंपत्तिरित्येतद्ब्रह्मवर्चसम् इति हलायुधः। ब्रह्मणो वर्चो ब्रह्मवर्चसम् । ब्रह्महस्तिभ्यां वर्चसः (अष्टाध्यायी ५.४.७८ ) इत्यच्प्रत्ययः। अतिवृष्टिरनावृष्टिर्मूषिकाः शलभाः शुकाः । अत्यासन्नाश्च राजानः षडेता ईतयः स्मृताः ॥ इति कामन्दकः ॥
Summary
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That my subjects live their full lifespan, free from diseases and calamities, is solely due to your spiritual power derived from the Vedas.
सारांश
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मेरी प्रजा जो पूर्ण आयु जीती है और रोगों एवं प्राकृतिक आपदाओं से मुक्त है, उसका मुख्य कारण आपका आध्यात्मिक तेज ही है।
पदच्छेदः
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| पुरुषायुषजीविन्यः | पुरुष–आयुस्–जीविन् (√जीव्+णिनि, १.३) | living a full human lifespan |
| निरातङ्काः | निर्–आतङ्क (१.३) | free from fear |
| निरीतयः | निर्–ईति (१.३) | free from calamities |
| यत् | यद् (१.१) | that which |
| मदीयाः | मदीय (१.३) | my |
| प्रजाः | प्रजा (१.३) | subjects |
| तस्य | तद् (६.१) | of that |
| हेतुः | हेतु (१.१) | cause |
| त्वद्ब्रह्मवर्चसम् | त्वद्–ब्रह्मन्–वर्चस् (१.१) | your spiritual power |
छन्दः
अनुष्टुप् [८]
छन्दोविश्लेषणम्
| १ | २ | ३ | ४ | ५ | ६ | ७ | ८ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|
| पु | रु | षा | यु | ष | जी | वि | न्यो |
| नि | रा | त | ङ्का | नि | री | त | यः |
| य | न्म | दी | याः | प्र | जा | स्त | स्य |
| हे | तु | स्त्व | द्ब | ह्म | व | र्च | सम् |
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